Thursday, September 27, 2012

मेरे साफ़ कमरे की कहानी



कम्बल के ऊपर गिरा नेल कटर,
खिड़की की दीवारों पर चिपके खीरे के बीज,
परदे की राड पे लटके टूटे हुक,
खिड़की पर चिपकी दो चिट,
जिस में एक पर किसी के जाने की खबर,
और एक पर किसी के आने का संदेशा,
जमीन पर गिरा स्टेप्लर,
दिवार पर टेढ़ी तंगी तस्बीर,
आईने पे चढ़ी धूल की परत,
अधखुली किताबों की अलमारी,
फर्श पर पड़े स्याही के गहरे निशान,
किताबों के ढेर पर रखे चाय के पुराने कपों की मुस्कान,
दूसरे बिस्तर में पड़े मोबाईल चार्जरों का जाल,
टेबल में पड़ी लैपटाप,पेन और कई डाईरियां,
सामने दीवाल में रखी सरस्वती की मूर्ति,
चौतरफा लटकते मकड़ी के आशियाने,
ढूंढती हैं पवन कमरे में आने के बहाने,
आलमारी के ऊपर रखी अधखुली इत्र की शीशी,
दीवाल में लगी पुरानी फोटो याद दिलाती है किसी की,
बिस्तर में रखे धुले कुर्ते की नीची लुढ़की बाजू
फर्श पर लुढ़की इंडिया टुडे के आवरण में छपा कानून का तराजू,
कलमदान में वर्षों से पड़े कई बंद पेन,
इन सब के बीच मेरा सोचता अस्थिर चंचल मन,
ये है मेरे साफ़ कमरे की कहानी,
सिर्फ और सिर्फ मेरी जुबानी ||

Monday, September 24, 2012

कुंवारी बिधवा



मिटटी,पत्थर,धूल इन्ही सब के बीच थी उस की ज़िन्दगी,
मजदूर जो थी वो...
दिन भर मेहनत करती,कभी किसी से कुछ ना कहती
न कोई आगे,न कोई पीछे, ना ही कोई दूर का कोई रिश्तेदार
होता भी क्यूँ? पैसा जो ना था उस के पास|
मैं छोटा था जब तब भी ज़िन्दगी उस की वैसे ही थी,
मेरी उम्र बढती गयी तब भी ज़िन्दगी उस की वैसे ही थी|
और आज मेरा बेटा छोटा है,पर उस की ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं|
न कोई श्रृंगार,न कोई लालिमा,न कोई ख़ुशी,
साल इतने बीते पर साड़ी के रंग तक में भी कोई बदलाव नहीं,
ज़िन्दगी भर मेहनत,सिर्फ दो वक़्त की रोटी के लिए
ना उस के घर कोई आता, ना कहीं जाते ही देखा मैंने उसे आजतक,
न कभी बीमार पड़ती,न कभी उस की दिनचर्या रूकती
सुना था मैंने शादी के तीन रोज में ही पति चल बसा
क्या नाम था उस का आज तक मुझे तो ये भी नहीं पता
नाम की उसे जरुरत ही नहीं पड़ी|
क्या करती नाम का ?  
न किसी को उस से मतलब रहता,न ही उसे किसी से मतलब रहता
मैंने तो ताउम्र उस के संघर्ष को देखा
पर अब उस के काम को मेरा बेटा देखता है
एक दिन यूं ही पूछ लिया उस ने
पापा उस औरत का नाम क्या है???
जवाब मेरे पास नहीं था,
पर पता नहीं कैसे मुहँ से निकल पड़ा
कुंवारी बिधवा     

Monday, August 06, 2012

धूमिल उम्मीदें शहर बसाने की ...


ज़िन्दगी 
कीमत क्या है तेरी?
वजन क्या है तुझे में?
कैसे तुझ पे बिस्वास करूँ
चंद घंटों की बारिश और सब कुछ तबाह...
सारे घर तबाह... सारे आशियाने तबाह
किसी की माँ गायब है तो किसी के पिता
किसी के बच्चे की खबर नहीं 
किसी के सुहाग का कुछ न पता 
सरकारी पैसा.....
हा हा हा....
साले सरकारी भडवे...
इस तबाही के वक़्त भी अपना हिस्सा मांगते हैं
सड़के,मकान जमीन,खेत खलिहान 
सब गायब हैं 
सब कुछ बह गये....
मुझे नहीं पता कब दुबारा फिर शहर बसेगा
मुझे नहीं पता फिर कब इस चमन में फूल खिलेगा
 मुझे तो हंसी आती है
कैसे दम्म भरते हैं इस ज़िन्दगी का हम
कैसे गुमान करते हैं इस ज़िन्दगी पे हम
पर एक झटके में सब गायब
बची है तो आज भी कुछ जिंदगियां 
और फिर से नया शहर बसने की कुछ धूमिल उम्मीदें ....

Wednesday, July 18, 2012

इस आधी रात में


इस आधी रात में 
जब कोई नहीं है साथ में
सिर्फ मै और मेरी तन्हाई...
अक्सर....
खामोश ही रहती है
कुछ न मुझ से कहती है....
सायं सायं मेरे कानो सिर्फ आवाजें आई हैं
ये भी तेरी यादों की परछाई है....
तुम होती...तो ये होता
तुम होती ...तो वो होता...
आज.....
तुम नहीं हो....तब भी जिंदा हूँ मै
जिंदा लाश तो नहीं....
खामोश बुत्त जरुर हूँ....
चाहतों के मायने थे क्या तेरे
कभी तो कुछ बताती 
कुछ तो मुझ को समझती 
समझता हूँ होशियार खुद को मै
पर ......
तेरे जज्बातों को न समझ सका 
तेरे इरादों को न समझ सका....
कोई नहीं चाहे भले ही....
कोई नहीं है साथ मेरे....
मुझे तो अब आदत हो गयी है....
और मै खुश हूँ ...
क्यूँ इस आधी रात में...
जब कोई नहीं है साथ में....
तेरे यादों की सायं सायं कानो में आज भी आवाज़ करती हैं.....

Saturday, June 23, 2012

फिर भी हिंद को बदलना है...


हिंद में है आग क्यूँ?
लुट रहा समाज क्यूँ?
मिट रहे ज़ज्बात क्यूँ?
बिक गया ईमान क्यूँ??
कोई तो मुझे बताये...

जल रही क्यूँ आज नारी?
बढ़ी क्यूँ भ्रस्टाचार की बीमारी?
क्यूँ बिक रही है डिग्री सारी?
कौन से कल की है ये तैयारी?
कोई तो मुझे बुझाये...    

लोग सब बेमान क्यूँ?
जनता भूखों परेशान क्यूँ?
नेता इतने हराम क्यूँ ?
और प्रशासन नाकाम क्यूँ ?
कोई तो मुझे समझाए....

पस्त है यूवा पीढ़ी सारी...
और मस्त है जनता सारी... 
राह क्या है अब हमारी?
कैसे अंधियारे कल की सवारी?
कोई तो मुझे दिखाए ...

मिल जाये जवाब अगर
दुबारा सोचना फिर मगर
चाहे कठिन है ये डगर
फिर भी हिंद को बदलना है.....

Wednesday, June 06, 2012

ख़ुशी मुझे है...


ख़ुशी मुझे है की तुम ने अपनी ख़ुशी पाई है,
उस में तुम खुश हो और तुम्हारी पूरी दुनिया समाई है|
क्या हुआ जो मुझे मेरा प्यार नहीं मिल सका?
क्या हुआ जो मुझे तेरा साथ नहीं मिल सका,
गलती मेरी ही है इस में,
जो मै सोचा धरती आसमान को मिलाऊंगा,
आसमा से करूँगा बातें,धरती को चिढाऊंगा,
टुटा मेरा सपना चूर चूर आज हो गया,
फिर भी खुश मै हूँ कि तुम ने अपनी खुशियाँ पाई है,
जिस मै तुम खुश हो और तुम्हारी दुनिया समाई है|
  खुश हूँ मै, जो जिंदगी में तेरे उल्लास है,
भुला तो कब का दिया होगा,
क्यूंकि बिमल तो पुरानी बात है,
पर मै नहीं भुला पाया,
क्यूंकि तू ही इक जीने का सहारा है,
तेरे बिना बिमल आज भी बेसहारा है,
पर छोड़ इन बातों को, इन बातों का न कोई अब मतलब है
फिर भी खुश मै हूँ कि तुम ने अपनी खुशियाँ पाई है,
जिस मै तुम खुश हो और तुम्हारी दुनिया समाई है|
कर सको जो याद कभी,तो याद मुझे कर लेना
यादों के झरोखों से,कुछ यादें आँखों में भर लेना,
मुझे पता है उस वक़्त तेरी आँखों में आंसू आयेंगे,
जो तुझे तब भी मेरा प्यार,मेरी अहमियत बतायेंगे,
शायद तब देर हो जाये,जिंदगी का कारवां रास्ता बदल जाये,
पर छोड़ तब की तब देखेंगे,किसने सब कुछ पाया है
फिर भी खुश मै हूँ कि तुम ने अपनी खुशियाँ पाई है,
जिस मै तुम खुश हो और तुम्हारी दुनिया समाई है|

Thursday, May 17, 2012

माँ


आज अकेले कमरे में बैठ आंखे भर आई,
कहीं से तेरी याद माँ दिल को छूने चली आई...
वो हाथों से रोटी खिलाना,वो अपने ही हाथों से रोज मुझ को नहलाना, 
वो दूध मुझे रोज पिलाना,वो लड़ने पे मुझे प्यार से समझाना,
मै तो बड़ा हुआ,पर तेरी ममता न बदली,
उम्र तेरी ढली पर ममता की कभी छावं न ढली, 
भले ही आज इतना मै दूर हूँ, पर तेरी छावं से ही महफूज हूँ,
तेरी दी खुशियों से ही तो माँ आज मै  मगरूर हूँ |
फिर भी न जाने क्यों आज मन उदास है,
तेरे पास आने की मेरे दिल की एक आस है,
सोचता हूँ तू मुझ से मीलों दूर, स्कूल के बच्चों को पढ़ाती
बिना कुछ परवाह किये, पूरे निस्वार्थ से,
पर जब तेरे कानों में मेरी उदास आवाज होगी,
खुद कड़ी हो कहेगी “बिमल बस अब बड़ा हो गया है तू” 
फिर प्यार से पूछेगी अच्छा बता हुआ क्या है ?
फिर तू मुझे समझाएगी...
चाहे शब्द वो ही हैं बचपन से,फिर भी सुनना मुझ को अच्छा लगता है
 तेरे उन ज़ज्बातों को समझना अच्छा लगता है,
उन के साथ ही इस तन्हाई में जीना अच्छा लगता है,
इस झूटी दुनिया में माँ सिर्फ तेरा आँचल सच्चा लगता है ...


Tuesday, March 20, 2012

कभी हम अनजान थे



कभी हम अनजान थे...
फिर आपस में बातें हुई...
फिर हम दोस्त बने...
फिर बातें बढ़ने लगी...
फिर दोस्ती प्यार में बदली...  
फिर बातों का कारवां चल पड़ा...
और हम एक दुसरे के ख़ास हो गये...
फिर बातों ही बातों में तकरार हुई...
फिर बातें कम होने लगी...
फिर रिश्ते में दरार आई...
फिर बातों का सिलसिला रुकने लगा...
फिर रिश्ता ख़त्म हुआ...
फिर बातें बंद हो गयी...
और आज फिर...
हम एक दुसरे के लिए अनजान हैं....  
   

Friday, January 27, 2012

असीम ख़ामोशी....

जो साथ तेरा था, वो ही कारवां मेरा था...
जो सपने तेरे थे... वो ही लक्ष्य मेरा था...
जो दोस्त तेरे थे...वो ही साथी मेरे थे...
जो सांसे तेरी थी...वो धड़कने मेरी थी...
जो गम तेरे थे... वो आंसू मेरे थे..
जो हंसी तेरी थी...वो खुशियाँ मेरी थी...
जहाँ मिस कॉल तेरी थी...वहाँ १ घंटे की कॉल मेरी थी
वक़्त बदला
न कारवां ही रहा न साथ ही बचा..
न सपने ही रहे न लक्ष्य ही बचे...
न तेरी दोस्ती ही रही...न मै तेरा साथी ही रहा...
तेरी सांसों का अब मेरी धडकनों से कोई वास्ता न रहा
आंसू तो अब मेरे हैं...तुझे गम है मुझे इस का न पता
खुशियों से तो अब कोई वास्ता ही नहीं तो उस पे क्या कहूँ?
पर आज न मिस कॉल का इन्तजार है, न ही कॉल की बेकरारी
दोनों तरफ है तो सिर्फ एक असीम असीम और असीम ख़ामोशी....
                  

Monday, January 09, 2012

मतलबी

ना वो मेरा रास्ता है ...
ना ही वो मेरी मंजिल है ....
फिर क्यूँ उन राहों में चले जा रहा हूँ ....
ना वो मेरा दोस्त है ...
ना ही वो मेरा सगा है ...
फिर क्यूँ उस को अपना कहे जा रहा हूँ ...
घिन आती है खुद पे ... और इस जिंदगी पे ...
इतना मतलबी बना गयी मुझे को ....
की अपनी माँ से भी उस के प्यार की वजह पूछ रहा हूँ ...