कभी हम अनजान थे



कभी हम अनजान थे...
फिर आपस में बातें हुई...
फिर हम दोस्त बने...
फिर बातें बढ़ने लगी...
फिर दोस्ती प्यार में बदली...  
फिर बातों का कारवां चल पड़ा...
और हम एक दुसरे के ख़ास हो गये...
फिर बातों ही बातों में तकरार हुई...
फिर बातें कम होने लगी...
फिर रिश्ते में दरार आई...
फिर बातों का सिलसिला रुकने लगा...
फिर रिश्ता ख़त्म हुआ...
फिर बातें बंद हो गयी...
और आज फिर...
हम एक दुसरे के लिए अनजान हैं....  
   
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असीम ख़ामोशी....

जो साथ तेरा था, वो ही कारवां मेरा था...
जो सपने तेरे थे... वो ही लक्ष्य मेरा था...
जो दोस्त तेरे थे...वो ही साथी मेरे थे...
जो सांसे तेरी थी...वो धड़कने मेरी थी...
जो गम तेरे थे... वो आंसू मेरे थे..
जो हंसी तेरी थी...वो खुशियाँ मेरी थी...
जहाँ मिस कॉल तेरी थी...वहाँ १ घंटे की कॉल मेरी थी
वक़्त बदला
न कारवां ही रहा न साथ ही बचा..
न सपने ही रहे न लक्ष्य ही बचे...
न तेरी दोस्ती ही रही...न मै तेरा साथी ही रहा...
तेरी सांसों का अब मेरी धडकनों से कोई वास्ता न रहा
आंसू तो अब मेरे हैं...तुझे गम है मुझे इस का न पता
खुशियों से तो अब कोई वास्ता ही नहीं तो उस पे क्या कहूँ?
पर आज न मिस कॉल का इन्तजार है, न ही कॉल की बेकरारी
दोनों तरफ है तो सिर्फ एक असीम असीम और असीम ख़ामोशी....
                  
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मतलबी

ना वो मेरा रास्ता है ...
ना ही वो मेरी मंजिल है ....
फिर क्यूँ उन राहों में चले जा रहा हूँ ....
ना वो मेरा दोस्त है ...
ना ही वो मेरा सगा है ...
फिर क्यूँ उस को अपना कहे जा रहा हूँ ...
घिन आती है खुद पे ... और इस जिंदगी पे ...
इतना मतलबी बना गयी मुझे को ....
की अपनी माँ से भी उस के प्यार की वजह पूछ रहा हूँ ...
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बचपन

छिन चुका है बचपन यहाँ...
दादी नानी के कहानियाँ के किस्से तो अब किताबों में मिलते है....
कभी जगह थी गिल्ली डंडा की बचपन में...
अब तो सारे बच्चे कंप्यूटर के आगे मिलते हैं....
कभी होता थी गुड्डे गुड़ियों की शादी....
अब तो सिर्फ बार्बी डौल शोकेस में दिखती है...
वक़्त कहाँ है खेलने को अब...
सारे बच्चे ही तो किताबों में दबे मिलते हैं....
फूल तो मुरझा जाएँ बचपन में ही...
तो कहाँ वो खुशबू आगे देते हैं....
लौटा तो बच्चों को उन का बचपन....
क्यूंकि ये ही तो पूरा जग महका देते हैं....
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चाहत

चाहत न थी दुबारा कभी उस से मिलने की....
चाहत न थी दुबारा कभी उस को सुनने की .....
न चाहत थी कि कभी लफ्ज फिर आपस में टकराएँ ....
चाहत न थी उसे देख मेरे आँखों में फिर से आंसू आये.....
पर....उस के.... 
"मुझे माफ़ कर दो बिमल मै मजबूर हूँ "
कह देने से ही सब तार तार हो गया....  

  
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वजह



रोज उस राह में रुक कर इंतजार किया करते थे उन का ....
पर उन की एक ना ने ...
रुकने और पीछे मुड़ने की वजह ही ख़तम कर दी .......
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घर के भगवान्




इन धर्म के ठेकेदारों की बात मानता रहा मै जिंदगी भर ....
बेजान पत्थरों को भगवान् मानता रहा में जिंदगी भर ...
सोचा की खुदा तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ इस की इबादत से ही है .....
और इस लिए अपने घर के भगवान् (माँ ,बाप)को पानी तक न पूछा जिंदगी भर ....
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