रुको ...क्या किसी को हराना इतना जरुरी है ?

डियर ज़िन्दगी कैसे हो ?
होप तुम अच्छी ही होगी , आज तुम्हे ख़त लिखने को मन तो नहीं था पर कुछ मौका बन गया | अब तुम सोचोगे कि मौका कैसा ? तो मौका ये थी कि अपनी ज़िन्दगी की गुफ्तगू करने के लिए जो चंद नंबर मेरे पास थे उन्हें जब फोन लगाया तो कई नंबर उठे नहीं , कई नंबर कहीं और गुफ्तगू में व्यस्त थे | तो तब मुझे लगा की छोड़ो यार दूसरों को खुद अपनी ज़िन्दगी से ही बातचीत कर ली जाए |

ज़िन्दगी पता तुम्हें मेरे आसपास के लोग सब भाग रहे हैं , तेज बहुत तेज और भी तेज | पर हर शाम या कहें कि कुछ एक शाम बाद जब उन्हें कहीं पहुँचते नहीं देखता तो मन दुखी होता है | हम सब या तो फिर अपने गुजरे पल का रोना रो रहे होते हैं या फिर अपने आने वाले पल के लिए समेट रहे होते हैं बस इस पल में कोई नहीं रहना चाहता | पिछले साल जब मैं राजस्थान के अम्बेर फोर्ट में लाइट एंड साउंड शो देख रहा था तो मैंने जब बीच में एक बार नज़र उठा कर पीछे देखा तो 80% लोग अपने कैमरे से उस नज़ारे को कैद करने में जुटे पड़े थे | कोई उस वक़्त को अपने आँखों में कैद नहीं कर रहा था , यही तो करते हैं हम |

बोर्ड एग्जाम कुछ जगह ख़त्म हो गये कुछ जगह बाकी हैं | उस के बाद रिजल्ट आएगा और उस के बाद होगा अच्छे कॉलेज में एडमिशन वाला हाई प्रोफाइल ड्रामा | इस के अलावा एंट्रेंस टेस्ट जैसे नीट और आई.आई.टी जी के रिजल्ट भी आयेगें | मेरे लिए सब से ज्यादा कठिन महीने होते हैं मई से लेकर अगस्त तक, क्यूंकि इस में हमारे देश में सुसाइड रेट बहुत बढ़ जाता है | मुझे बहुत बुरा लगता है इस फैक्ट को जब भी मैं बार बार सुनता हूँ कि हमारा देश यूथ सुसाइड में नंबर 1 पर है | किसे दोष दें इन आत्महत्याओं का ? बच्चों को , उन के माँ बाप को या सोसाइटी को ? क्यूँ हम कभी ये नहीं समझ पाते कि किसी भी बड़े कॉलेज में पहुँच जाना ज़िन्दगी का आखिरी लक्ष्य नहीं हो सकता | ज्ञान और अच्छे मार्क्स के बीच में कोई संबंध नहीं है अच्छे मार्क्स लाना एक अच्छी प्लानिंग का नतीजा है न कि अच्छी पढाई का | दुनिया बदलने के लिए अगर अच्छे मार्क्स लाना ही जरुरी होता तो कहाँ हैं सालों साल की मेरिट लिस्ट वाले वो बच्चे ? क्यों गायब हो जाते हैं सिर्फ एक बार स्टार बनने के बाद वो ? मैं अच्छे मार्क्स का विरोध नहीं करता पर मुझे लगता है कि सिर्फ अच्छे मार्क्स लाना ज़िन्दगी की सफलता का सक्सेस मंत्र नहीं है |

मेरा भाई डॉ. है क्यूंकि वो ये चाहता है , मैं डॉ. नहीं हूँ क्यूंकि मैं ये नहीं चाहता | मुझे मजा आता है दुनिया घूमने में, नए नए लोगों से मिलने में, नई नई कहानियां लिखने में, दुनिया भर के युवाओं से मिलने में और मैं इस बात पर बहुत खुश हूँ | कुछ एक दिन पहले मेरी चचेरी छोटी बहिन ने मुझ से एक बात कही, उस ने कहा कि भैय्या मैं जब पूरे परिवार के सामने बड़े भैय्या की रिस्पेक्ट होते देखती हूँ तो मुझे आप के लिए बुरा लगता है , आप को बाहर वाले तो इतना रिस्पेक्ट देते हैं पर परिवार वाले नहीं समझ पाते | मैं चाहती हूँ कि आप इतने बड़े आदमी बन जाओ की आप बड़े भैय्या को हरा दो | उस के सवाल पर मैं उस के मन को पढ़ पा रहा था कि कैसे सोसाइटी का इफ़ेक्ट उस के दिमाग में ये असर पैदा कर रहा है कि वो दो भाइयों को उन के प्यार नहीं बल्कि उन के ओहदे की नज़र से देखे | मैंने उस का जवाब दिया कि ये मेरी ज़िन्दगी है और मैं किसी को हराने या किसी को कुछ दिखाने के लिए नहीं कर रहा हूँ | जो मैं कर रहा हूँ उसे मैंने चुना है और ये मेरी सच्चाई है कोई उस पर क्या सोचता है ये मेरी दिक्कत नहीं है | मैं भाई को कैसे हरा सकता हूँ जब कि हमारे रास्ते ही बिल्कुल अलग अलग हैं, और किसी को हराना ही क्यूँ है ? जब कभी लगे कि तुम भीड़ के साथ साथ भाग रहे हो या तुम्हें किसी को हराना है वो रुक जाओ वहीँ पे सोचो इस बात पे कि क्या किसी को हराना इतना जरुरी है ? अपनी ज़िन्दगी जियो और खुश हो के जियो | सुना होगा न जियो और जीने दो |  
ये ज़िन्दगी मेरी अपनी है,सब की ज़िन्दगी में उतार चढाव चलते रहते हैं और ये उतार चढ़ाव बताते हैं कि हम जिंदा है बस हौसला नहीं खोना है हमें | कोई इंसान या सोसाइटी इतनी ताकतवर नहीं हो सकती कि उस के एक सवाल या आरोप से मेरा पिछला अनुभव सारा धरा का धरा रह जाए | बात करो दुनिया भर में बहुत लोग हैं उस से अलग अलग मुद्दों पर बात करो | उन्हें समझो कैसे उन्होंने खुद और अपने ज्ञान को खड़ा किया है |दूसरे के ज्ञान से घबराओ नहीं , अपनी समझ पैदा करो | खुद के लिए लक्ष्य रखो ,खुद को हराओ तब देखो कि ज़िन्दगी में कैसा नयापन आता है |
बात करो अगर परेशान हो तो , क्यूंकि बात करना बहुत जरुरी है , कहानी लिखो ,कविता लिखो ,फेसबुक पर लिखो,ऑडियो रिकॉर्ड करो , ब्लॉग लिखो कुछ भी हो खुद को जाहिर करो हर हालत में | बस कभी अकेले मत परेशान हो |
आज के लिए बहुत बात हो गयी तुझ से मिलतें हैं फिर जल्दी नए किस्सों के साथ
तुम्हारा
जज्बात ए बिमल      


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अस्तित्व की सामाजिक लड़ाई है "विधवा "

ये बात कहने का ख्याल मेरे दिमाग में पहली बार तब आया था जब 2013 में मैंने एक 21 साल की लड़की को देखा जिस ने तीन महीने पहले ही केदारनाथ आपदा में अपना पति खोया था | जो एक सरकारी कार्यक्रम में मुआवजे का चेक लेने देहरादून आई थी और भीड़ में सबसे पीछे बैठ कर अपने पर्स से निकाल कर बिंदी लगा रही थी | अचानक उसका नाम आगे से पुकारा गया उस का हाथ सबसे पहले उस बिंदी पर गया और उसे हटा के आगे सरकारी चेक लेने आगे गयी | मेरे दिमाग में पहला सवाल यही था कि क्यूँ उस ने वो बिंदी हटाई ? क्यूँ वो उस के साथ आगे स्टेज पर या यूँ कहें समाज के सामने क्यूँ नहीं गयी ? मैं ये सवाल उस से नहीं पूछ पाया क्यूंकि उस कार्यक्रम के बाद मैंने उसे नहीं देखा, सच कहूँ तो मैंने उसे खोजा ही नहीं क्यूंकि ये सवाल पचाने में मुझे काफी वक़्त लगा |

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों पर बातचीत हो रही है | हर क्षेत्र में महिलाओं की बढती भागीदारी बढ़ते समाज का एक अच्छा पक्ष हमारे सामने रख रहा है | ऊपर लिखी घटना की छाप मेरे दिमाग में काफी गहरी थी तो मैंने पड़ताल को इस मुद्दे पर केन्द्रित किया | वर्तमान समाज में एकल महिला एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिस पे बहुत कुछ आजकल लिखा जा रहा है पर मैं एकल महिला विषय पर सिर्फ और सिर्फ विधवा महिलाओं पर आज भी कोई खुल कर बात नहीं करता |

 महिला अधिकारों पर कई वर्षों से कार्यरत दीपा कौशलम ने बताया कि अगर बात करें दुनिया की तो सन 2015 की विश्व विधवा रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में विधवाओ की संख्या 258,481,056 बताई है जो की 2010 के मुकाबले 9% अधिक है। उत्तराखंड के आंकड़ों की बात करें तो 2011 में हुई जनगणना के अनुसार 30 से 79 वर्ष तक विधवाओं की संख्या 337295 है | यह आंकड़ा 2011 का है उस के बाद हम केदारनाथ आपदा झेल चुके हैं और भी कई तरह की घटनाओं के हम गवाह हैं जिस से यह आंकड़ा और बढ़ा है उत्तराखंड राज्य से काफी लोग सेना में हैं और जो कि सीमा पे शहीद भी होते हैं तो यहाँ पर शहीदों की विधवाओं का भी काफी ज्यादा है |

हमारे समाज में विधवाओं को एक अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता | शास्त्रों में कही बातों के अनुसार उनके पापों की वजह से वो विधवा हुई हैं | विधवा होना सबसे पहले उस की सामाजिक पहचान को ख़त्म करता है क्यूंकि पुरुष प्रधान समाज में उस की पहचान का केंद्र पुरुष है अगर वही ख़त्म हो गया तो कैसी पहचान ? विधवा होना उसकी ज़िन्दगी का हर रंग छीन लेता है | शादी या अन्य कार्यों में होने वाले नाच गाने से उस की उपस्थिति ख़त्म हो जाती है |

राज्य महिला आयोग उत्तराखंड की सचिव रमिन्द्री मन्द्रवाल ने बताया की इस तरह की स्थिति किसी भी महिला को अलग अलग स्तर पर तोड़ देती है जैसे कि भावनात्मक, आर्थिक तथा सपोर्ट सिस्टम | भावनात्मक रूप से देखें तो किसी भी महिला के लिए कठिन होता है इस स्थिति को समझ पाना क्यूंकि बच्चों का भविष्य और खुद का भविष्य उसे धुंधला नज़र आने लगता है | आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा प्रभावित होती है क्यूंकि अधिकतर उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में महिलाएं ज्यादा आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं ऐसे में उन्हें अपनी जरूरतों के लिए आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है | तीसरा मुख्य बिंदु सपोर्ट सिस्टम, उन्हें न सास ससुर से मदद मिल पाती है न और न ही माँ बाप ही अच्छे से सपोर्ट कर पाते हैं | विधवा होना एक तरह से उनके अस्तित्व की ही लड़ाई है | दुबारा शादी का सवाल इतना आसान नहीं है क्यूंकि शादी तो हो ही जाएगी पर सवाल बच्चों का है | क्यूंकि ये असमंजस की स्थिति हमेशा बनी रहती है कि पता नहीं कोई दूसरा आदमी बच्चों को अपनाएगा या नहीं अपनाएगा ऐसी स्थिति में वो अकेले ही रहना ज्यादा सही समझती हैं |

केदारनाथ आपदा के बाद उत्तराखंड के तक़रीबन 150 परिवारों की जनसँख्या वाले चमोली जिले के  देवली भणी गाँव में 50 के करीब विधवाएं हैं | जिसमें 20 के करीब बहुत कम उम्र यानि 25 के करीब है | उनके ही बीच की एक लड़की रचना कपरवाण ने कहा कि मुझे दुःख होता है जब मैं देखती हूँ कि शादी पार्टियों में इन्हें शामिल नहीं होने देते,मेकअप नहीं करने देते | उसने हँसते हुए बताया कि मेरी हम उम्र दोस्त जो कि विधवा है उस के बारे में एक सपना देखा कि उसकी दुबारा शादी हो रही है , पर सच में सपना ही है | मैं चाहती हूँ उन्हें इज्ज़त मिले , वो स्वतंत्र हों किसी एन.जी.ओ के सहारे ज़िन्दगी न काट दें , किसी के दबाव में न आयें | वो अपनी अधूरी जी रही ज़िन्दगी को पूरा जियें कमी जो है उसे भरने की कोशश करें |

उत्तराखंड में एकल महिला के विषयों पर एक ग्रुप “स्वयं सिद्धा” कार्य कर रहा है | “स्वयं सिद्धा” की संचालिका शोभा रतूड़ी ने बताया कि अधिकारों पर बात करना बहुत जरुरी है | विधवा पेंसिन को बढ़ाने की बात सरकार के समक्ष रखी थी जो मुख्यमंत्री ने मानी भी थी | जनसुनवाई हमारा एक तरीका है एकल महिलाओं तक पहुँचने का जिसमें शहर और गाँव की महिलाओं की अलग अलग समस्याओं से हम रूबरू होते हैं |  
  
यह सच में महिला सशक्तिकरण का दुनिया भर में डंका पीटने वाले देश के लिए भयावाह स्थिति है | विधवा महिला को डायन कह देना या पति की मौत के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना पूरे भारत में आम है | ऐसी महिला का चरित्र सदा शक के दायरे में डाल दिया जाता है , चाहे वो किसी से भी 2 मिनट बात भी कर ले तो | हमारा समाज काफी दोगला समाज है किसी पुरुष की पत्नी मार जाने पर साल दो साल में हम बच्चों के नाम पर उस की शादी करवाने पर तुल जाते हैं पर उसी स्थिति में जब किसी महिला का पति मरता है तो हम समाज की दुहाईयाँ देने लगते हैं | इस बात से ये बात भी जुडी है कि बच्चों के नाम आदमी की शादी करा कर उसे सेक्स लाइफ को आगे बढ़ाने की छूट है पर हमारे यहाँ महिलाओं को ये छूट या कहें कि सुविधा नहीं है |

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नजदीक जनजातीय क्षेत्र जौनसार में थोडा नजरिया अलग है | अगर कोई लड़की विधवा हो जाती है तो उसे हीनता से नहीं देखा जाता और अगर वो अपने माँ बाप के घर लौटना चाहे तो उसे पूरे अधिकार मिलते हैं | रहने की जगह खेती बाड़ी के साथ साथ उस के बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी उस के नजदीकी रिश्तेदार अच्छे से निभाते हैं | कई अन्य जनजातीय क्षेत्र भी भेदभाव से परे हैं | ऐसे में एक सवाल मेरे मन में आता हैं कि जिन जनजातीय क्षेत्रों को हम पिछड़े हुए और जंगली कहते हैं क्या वो हमारे मुख्य धारा के समाज से सोच में कई सदी आगे नहीं हैं ? जो एक दुर्घटना से किसी की ज़िन्दगी की मुस्कान नहीं छीन लेते |


कोई एक घटना दुर्घटना किसी की ज़िन्दगी की मुस्कान नहीं छीन सकती न रंग छीन सकती है | अपने आसपास हो रही ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं दें | दुनिया बदलने की पहली कड़ी हम हैं और इस तरह के भेदभाव को हमें ही रोकना होगा |                        
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मेरे सवाल और देशद्रोह


मैंने पूछा कि ये सड़क क्यूँ सालों से नहीं बन रही ?
उस ने कहा चुप रहो, वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुम्हें सड़क की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने पूछा लाखों बच्चे स्कूल क्यूँ नहीं जा पा रहे ?
उस ने कहा चुप रहो वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुम्हे बच्चों के स्कूल की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने पूछा लाखों युवा बेरोजगार क्यूँ हैं ?
उस ने कहा देशद्रोही कहीं के चुप हो जाओ, वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुम्हें युवाओं की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने पूछा माजरा क्या है कि अपने ही देश में हम सुरक्षित नहीं हैं ?
उस ने कहा कि खामोश ,वहां सीमा पे जवान मर रहे और तुम्हें खुद की सुरक्षा की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने जानना चाहा कि देश में इतना भ्रष्टाचार क्यूँ है ?
उस ने कहा तू राष्ट्रद्रोही है ,वहां सीमा पे जवान मर रहे और तुम्हें भ्रष्टाचार की पड़ी है |
और मैं इस बार भी चुप हो गया |


मैंने कहा इतने बड़े बजट के बाद भी सीमा पे जवानों को सही खाना क्यूँ नहीं मिल रहा ?
उस ने कहा चुप हो जा वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुझे उन के खाने की पड़ी है ?
मैंने कहा भाई मेरा सवाल भी तो वही है कि क्यूँ सीमा पे जवान भूखे पेट मर रहा है?
उस ने फिर कोई जवाब नहीं दिया .....
और मुझे देशद्रोही का सर्टिफिकेट जारी कर दिया
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प्यार की पाती || लव मैरेज अरेंज मैरिज और कुछ उखाड़ना

Hey #UNKNOWN

हाँ क्यूंकि अभी तुम्हारा अता पता दोनों ही लापता है | सुनो 2017 का Happy Valentine day  , अरे घबराओ नहीं तुम जिस साल भी मुझ से मिलो तो मैं तुम्हे अपनी ज़िन्दगी के पहले साल से लेकर उस साल जिस साल तुम मुझे मिलोगी तब तक के सारे वैलेंटाइन डे विश कर दूंगा और सिर्फ वैलेंटाइन डे ही क्यूँ हम तो पूरे साल इश्क का त्यौहार मनाएंगे |

मैं पिछले हफ्ते कुछ यूथ से बात कर रहा था . मुद्दे की बात पर लाने के लिए मैं अक्सर मुद्दे से अच्छी तरह से भटका के बात शुरू करता हूँ तो फिर टॉपिक पर लाना आसान रहता हैं | एक ने मुझ से पूछा सर अरेंज मैरिज और लव मैरेज में क्या फर्क है ? मैंने कहा यार एक उम्र तक स्कूल में कॉलेज में हम बहुत ट्राय करते हैं | कुछ से पट जाती है और लम्बी पटती है और फाइनली दोनों शादी कर लेते हैं तो उसे लव मैरिज कहते हैं, हाँ लव के मैरिज तक पहुँचने के बीच काफी अलग अलग तरह के मैलो ड्रामा भी होते हैं पर उन ड्रामों का किरदार बनने के बाद जब नाटक ख़त्म होता है तो विजेता ट्रॉफी यानि तुम्हारी लवर तुम्हारी धर्म पत्नी तुम्हारे पास होती है |

तो सर फिर अरेंज मैरिज क्या है ? एक ने बड़ी मासूमियत से पूछा तो मैंने जवाब दिया भाई जब अपने पूरे बचपन और जवानी में तुमसे कुछ नहीं उखाड़ता , किसी ने तुम्हे कभी घास नी डाला होता या कभी तुम्हारे दिल के प्यार के बीज को सामने की तरफ से खाद पानी और मिटटी नहीं मिलती तो तुम अपने घर वालों को अपनी जगह पर उखाड़ने भेजते हो | और जब वो तुम्हारे लिए कुछ उखाड़ देते हैं और तब उनकी मेहनत पर तुम बिजेता ट्रॉफी लेकर भीड़ के सामने फोटो खिचवाते हो तो उसे अरेंज मैरिज कहते हैं |

उस्ताद बनने की कोशिश में एक ने सवाल दागा सर मैं समझ गया अच्छे से पर क्या कुछ उखाड़ना जरुरी है ? भाई मेरे कुछ नया और अच्छा लगाने के लिए पुराना उखाड़ना बहुत जरुरी है ... मैं हाज़िर जवाबी दिखाते हुए कहा |

सुनो यार मुझे अब लगने लगा है कि इतने सालों में मैं भी कुछ नी उखाड़ पाया और मैंने तो वैसे भी हिमांचली सेब को देहरादून की जमीन पे उगाना चाहा कहाँ से कुछ उगता कुछ ? भारत के कोने कोने की जमीन को कुछ उखाड़ने के लिए तलाशा पर शायद मिटटी कुछ ज्यादा ही शख्त थी ... खैर

इंतजार है तुम्हारा वैसा ही जैसे एक बिखरे बालों को समेटने वाली क्लिप या बैंड का .. इंतजार है तुम्हारा मुझे अपने किस्से कहानियां समेटने के लिए , इन्तजार है तुम्हारा मुझे उस स्वेटर को बुनने के लिए जिसकी आखिरी सलाई तुम हो | इंतजार है मुझे तुम्हारा ऑनलाइन बैंकिंग के #OTP पासवर्ड की तरफ जिस के बिना हम कभी शौपिंग नहीं कर सकते ... इंतजार है मुझे तुम्हारा....
ये शायद मेरा तरीका हो कुछ उखाड़ने का ....अपने घर वालों को कुछ उखाड़ने भेजने से पहले ...



तुम्हारा
कुछ भी बुला लेना प्यार से तुम्हारी मर्ज़ी
J
        
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ज़िन्दगी के नाम ख़त || पाना खोना और खोना पाना दोनों के मतलब

डियर ज़िन्दगी..
पता नहीं कभी तुम्हे किसी ने ख़त लिखा या नहीं , पर आज मेरा मन हुआ तुमसे बतियाने का | सोचा तो नहीं कि किस स्पेशल टॉपिक पर तुमसे बात करूँ ....

मैं ऊँचे पहाड़ों के बीच रहता हूँ ,यहाँ नदियाँ हैं, झरने हैं, बर्फ से ढकी वादियाँ हैं , पहाड़ के सीधे लोग हैं और हर पहाड़ की चोटी पर किसी न किसी भगवान् का मंदिर है | कहते हैं पहाड़ों पर बच के रहना चाहिए, कभी ऊँची आवाज़ में गाना नहीं चाहिए कभी बांसुरी नहीं बजाना चाहिए कभी जोर से गुनगुनाना नहीं चाहिए क्यूंकि पहाड़ों में आछरियाँ(परियां) रहती हैं | उन्हें ये सब चीजें पसंद हैं तो जो भी ये सब करता है उसे हर (अपहरण) कर के ले जाती हैं |

मेरा भी मन करता है कभी कभी कि मिलूं उन आछरियों से बात करूँ उन से, कुछ एक बालगीत सुनाऊँ उन्हें ...पता नहीं उन्हें बालगीत पसंद आयेंगे या नहीं हा हा हा ... सूरज के देश में चंदा के गाँव में .... या फिर ... सूरज गोल चंदा गोल... या कोई कहानी सुना दूंगा उन्हें अपनी लिखी कोई... मैं बादलों में उड़ना चाहता हूँ उन के साथ... ऊँचे से ऊँचे पहाड़ों को छूना चाहता हूँ उन के साथ... और मन हुआ तो फिर लौट आऊंगा फिर अपनी इस ज़िन्दगी में वापस ...और हाँ उन्होंने छोड़ा तो, क्यूंकि सारी कहानियों में हरण करने की कहानियां तो हैं पर लौटने की कहानियां एक भी नहीं....

किसी भी पल को महसूस करना एक अलग एहसास है , मुसाफिर बने रहने के चक्कर में ज़िन्दगी तुम और  दुनियां दोनों ही पीछे छुटती गयी | छोटे बच्चों को जिद्द करते देखा ही होगा तुमने कुछ आंसू गिराए नहीं कि सारी दुनिया चल पड़ती है उन ज़िद्दों को पूरा करने और आंसुओं को साफ़ करने , पता अब वो दिन याद आते हैं क्यूंकि बड़े होक हम जिद्द नहीं कर पाते क्यूंकि अब आंसुओं के सैलाब भी किसी का दिल नहीं पिघला पाते |

ज़िन्दगी बहुत खुबसूरत हो तुम पर तुम्हारी खुबसूरती की कीमत बहुत भारी भरकम है | मकड़ी का जाला हो तुम फंस जाते हैं इसमें सारे | पाना खोना और खोना पाना दोनों के मतलब हिंदी की किताब के हिसाब से तो एक ही हैं पर तेरी हिसाब से बिल्कुल अलग |

मैं अकेला पहाड़ों, नदियों से बातें करता हूँ वो जवाब भी देते हैं वो ज्यादा अच्छे हैं वो धोखा नहीं देते कभी मजाक नहीं उड़ाते कभी , वो सब कुछ सुनते हैं , वो बहुत अच्छे हैं |

ज़िन्दगी वक़्त के पन्ने पलट के मुझे बचपन में पहुंचा दे आज ही जहाँ कीमत है आंसुओं की.... शायद बहुत से रिश्ते ज़िद्दों में ही पा लें हम जो हम ने खो दिए हैं जाने अनजाने पाने,खोने और खोने पाने के चक्कर में...
आज इतना ही कभी और फिर गुफ्तगू करेंगे ...
तुम्हारा
ज़ज्बात ए बिमल 
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क्या हम वाकई सुरक्षित हैं न्याय के दरवाज़े तक पहुँचने के लिए ? :: प्रधान न्यायाधीश के नाम ख़त

माननीय
             प्रधान न्यायाधीश
              सर्वोच्च न्यायालय
                    भारत
पहला ख़त आप को लिख रहा हूँ और बहुत मजबूर हो कर लिख रहा हूँ | मैं रिसर्च प्रोग्राम का  हिस्सा बन के भारत के गांवों को करीब से देख रहा हूँ, समझ रहा हूँ | भारत के विकास के लिए चल रही योजनाओं को करीब से जान रहा हूँ कि कैसे योजनायें बनती है कैसे जमीन पर पहुँचती हैं और उस के फेल पास होने के क्या क्या कारण होते हैं ? इस दौरान मेरे पास कुछ एक सरकारी स्कूल भी हैं जहाँ के बच्चों को मैं पढ़ता भी हूँ और हर सरकारी कार्यक्रम चाहते न चाहते हुए भी जोर शोर से मनाता हूँ | ये कार्यक्रम मैं सिर्फ इस लिए नहीं मनाता क्यूँकी ये सरकारी आदेश होते हैं बल्कि इन कार्यक्रमों का अच्छा पक्ष बच्चों को समझाता हूँ | आज मुझ से एक छोटे से बच्चे ने सवाल किया कि गुरूजी कल कुछ लोगों को कोर्ट में वकीलों ने मारा किसी ने उन्हें क्यों नहीं रोका ?

मेरे पास जितना जवाब था मैंने उसे दिया पर उस के बाद मेरे मन में आप से पूछने के लिए कई सवाल खड़े हो गये | क्या न्याय पाने की एक मात्र जगह भी सुरक्षित नहीं है ? हम पुलिस पर विश्वास नहीं करते मिडिया पर विश्वास नहीं करते ,सरकार पर विश्वास नहीं करते ,हम सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं पर विश्वास नहीं करते, क्यूँकी सबने हमे ठगा है हमें धता दिखाया है हम ने इन सबके खिलाफ धरने दिए हैं ,कैंडल मार्च किये हैं ,जुलुस निकाले हैं ,गिरफ्तारियां दी हैं ,लाठियां खाई हैं क्यूँकी हमें विश्वास था कि हम सब सस्थाओं के खिलाफ हो लें पर जब हम न्याय के लिए आप के पास आयेंगे तो आप हमारी आवाज़ जरुर सुनेंगे हमें कम से कम बाहर नहीं पर न्याय के परिसर में बेख़ौफ़ होकर अपनी बात रख पाएंगे |

मेरी नाराजगी आज आप से है  मेरी नाराजगी सच में आप से है कि कैसे आप के परिसर में पत्रकारों को कल पीटा गया | मैं ये बात एक पत्रकारिता के छात्र होने के नाते नहीं कह रहा बल्कि एक आम आदमी के नाते कह रहा हूँ कि मुझे आप ही बताओ कि मैं सुरक्षित कहाँ हूँ ?

क्या मैं अपने देश में सुरक्षित हूँ ? मैं अगर भारत की किसी योजना पर अपनी टिप्पणी देता हूँ तो मैं देश द्रोही हो जाता हूँ ,मेरी माँ बहिन दोस्त इस देश में अपनी मर्ज़ी से जी नहीं सकती, अपनी मर्ज़ी के कपडे नहीं पहन सकती, अपनी बात नहीं रख सकती अपनी मर्ज़ी से बाहर नहीं जा सकती शादी नहीं कर सकती | हम तो अपनी लैंगिकता को भी अपनी इच्छानुसार नहीं रख सकते | फिल्मों, साहित्यों, कलाओं, वाद विवाद के केन्द्रों पर प्रतिबन्ध लग रहे हैं | मैं चाहते न चाहते हुए भी धर्म जात की राजनीति पर मजबूर हो रहा हूँ | कहने को मैं आज़ाद भारत में पैदा हुआ और शिशु /विद्या मंदिर के स्कूल में पढ़ते हुए अपने देश के बड़े गौरव गान सुने हैं मैंने पर वहां से निकलने के बाद जब मैं उसे धरातल पर खोजता हूँ तो मुझे वह कहीं नहीं मिलता और सिर्फ यह दिखता है कि देश और राष्ट्र वाद के नाम पर जहर बो रहे हैं और जहर काट रहे हैं |

मैं कभी विरोध और मुर्दाबाद की राजनीति का समर्थक नहीं रहा मैं हमेशा जमीन पर लोगों के साथ खड़े होकर स्थानीय जवाबों का समर्थक रहा हूँ और हमेशा न्याय पर विश्वास रखने वाला रहा हूँ पर आप ही बताइए मैं कैसे भीड़ में खड़े आम आदमी को ये विश्वास दिलाऊ कि हमारे न्यायालयों में सब की सुनवाई होती है ? मैं कैसे लोगों से बात कहूँ कि जब सारे दरवाज़े बंद हो जाएँ तब भी न्याय की रौशनी बाकी है ? कोर्ट में पीटे जाने के बाद मन में सवाल जरुर उठ रहा है कि क्या हम वाकई सुरक्षित हैं न्याय के दरवाज़े तक पहुँचने के लिए ? और ये सवाल सिर्फ मेरे दिमाग में है इस पर मुझे बहुत बड़ा शक हैं |

सबसे बुरा तक होता है जब आवाजें मरनी शुरू होती है और विचारों का दमन शुरू होता है और अगर आज अगर न्याय के परिसर में भी ये सब शुरू हो गया तो फिर कैसे आज़ादी ? कैसे संस्कृति ? और कैसा राष्ट्रवाद ?

मेरी राजनैतिक समझ बिल्कुल नहीं है तो किसी मुद्दे पर बात नहीं करूँगा बस माननीय न्यायाधीश महोदय भीड़ में खड़े आखिरी इंसान के लिए आप तक पहुँचने तक का रास्ता बंद हो ऐसी नौबत मत आने दीजियेगा क्यूँकी उस के लिए न्यायालय ही इन्साफ की पहली और आखिरी सीढि हैं | मेरी लिखी बातों में कोई गलती हो तो मुझे माफ़ करें पर आप इन बातों का सीधे संज्ञान लेकर तथा उचित कदम उठा कर न्याय पर लोगों के विश्वास को बचा सकते हैं |   
आप पर विश्वास रखने वाला
बिमल रतूड़ी        

  

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फिर भी क्या सुनेंगे लोग मुझे ?


खड़े हो कर सबके सामने बोलने के लिए हौसला चाहिए, 
आम भीड़ में बोलने के लिए शब्दों का जाल चाहिए,
ख़ास भीड़ में बोलने के लिए हुनर चाहिए,
कोई कहता है पढो पुराने और नए लोगों की लिखी बातें, 
उन का नजरिया सुनो और कहो उन की कही बातें,
और इन बातों से हर वक्त डर सा जाता हूँ मैं, 
कि कहीं वो बात मुझ में है या नहीं, 
कहीं वो जज्बात मुझ में है या नहीं, 
क्यों कहूँ मैं नजरिया किसी और का, 
क्यों कहूँ मैं अनुभव किसी और का,
मैंने नहीं पढ़ा किसी और को ,
मैंने नहीं सुना किसी और का लिखा,
सिर्फ थोडा घूमा और बतियाया है कुछ लोगों से 
पर  फिर भी क्या सुनेंगे लोग मुझे ?
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