आमिर खान के नाम ख़त || सत्यमेव जयते पे पलीता


नमस्ते आमिर बाबू,
कैसे हैं , जो किस्से कहानियां आप कह रहे हैं समझ सकता हूँ आप के दिल में क्या चल रहा है | सच कहूँ तो मोदी जी जिस दिन से प्रधानमंत्री बने थे मुझे यही उम्मीद थी कि यही सब देश में होने वाला था | राजनैतिक,धार्मिक,बौद्धिक स्वतंत्रता पर जिस तरह के कुठाराघात हुए हैं कई सवाल खड़े करता है ये | देश में माहौल वाकई बहुत ख़राब है | मुद्दे अब इन्टरनेट में चलने वाले पॉपअप की तरह हो गये हैं मुझे सच में याद नहीं आ रहा बिहार इलेक्शन के बाद मैंने “गाय” पर कोई अच्छी खबर या डिबेट देखी हो | भटक गये हैं हम बहुत ज्यादा | यहाँ पर लेखकों के अवार्ड वापसी पर खूब हंसी ठट्ठा हुआ क्यूंकि चाहे भले ही वो अपनी भाषा या ज्ञान के सर्वश्रेष्ट हों पर वो उँगलियों पर गिने जाने वाले चंद लोग हैं , उनका मजाक उड़ाना बहुत आसान है पर मुझे एक भी हास्य व्यंग फौजियों पर उड़ता सुनाई नहीं दिया, क्यों ? अजी वोट बैंक हैं वो पूरे देश की कई लोकसभा विधानसभा सीटों का भविष्य तय करते हैं वो फौजी | हाँ बाबू सब वोट बैंक की राजनीति है |

पर मैं आप को ये सब क्यूँ सुना रहा हूँ क्यूंकि अधिकतर बातें आप को मुझ से ज्यादा ही अच्छी तरह से पता होंगी |    

"कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है "
आमिर बाबू आप की ही फिल्म "रंग दे बसंती" का डायलॉग है न ये, ये वही फिल्म है जिसे मैं आजतक 100  से ज्यादा बार देख चुका हूँ जब भी मैं यहाँ के सिस्टम से परेशान होता हूँ तो अन्दर छटपटाहट होती है तो इसी फिल्म को देख कर खुद को मोटिवेट करता हूँ | कॉलेज में पढने वाले अधिकतर लड़के “सत्यमेव जयते” के सारे सीजन के विडियो अपने पास रखते हैं और देश गर्व करता है आप पर कि देश के मुद्दों को इस तरह से पहली बार उठाया गया | दुनिया भर में “अतुल्य भारत” से जो आप ने हमारी इमेज गढ़ी थी वो आप एक स्टेज से भरभराकर कर गिरा दी ....
मैं सहमत हूँ देश में हालात ठीक नहीं है पर यही बात अगर आप अपनी किसी फिल्म या डाक्यूमेंट्री के माध्यम से कहते तो शायद उस बात में अलग वजन होता | आप की कही बात ने असहिष्णुता पर बहस घुमाने से ज्यादा हिन्दू मुस्लिम मुद्दे को हवा दे दी है | आप के लिए दुनिया के किसी भी कोने में रहना आसान है पर देहरादून में बंजरावाला के चाँद चक इलाके में रहने वाले मुश्ताक चचा कैसे किसी पर विश्वास करें ? कैसे वो अपने बच्चे  को पढने या नौकरी करने बाहर भेजें क्यूंकि उनकी कौम के सबसे बड़े कलाकार ने तो कह दिया कि उन का परिवार यहाँ के माहौल देख के देश छोड़ के जाना चाहता है ....
अपनी बात कहना जरुरी है , विरोध प्रतिरोध करना उस से जरुरी है, क्यूंकि विरोध तंत्र के खिलाफ होता है किसी एक आदमी के खिलाफ नहीं | आमिर भारत ने आप को गढ़ा है आप ने खुद पे मेहनत की पर उस मेहनत की कद्र पूरे भारत ने की |
आप बतिया कर हंगामा कर करेंगे उम्मीद नहीं थी , आप से एक नए तरह की विरोध की उम्मीद थी , आप से उम्मीद नहीं थी कि आप भारत को धडों में बाँटने की कोशिश करेंगे , आप से उम्मीद नहीं थी कि आप भागने की बात करेंगे ...
केवल रंग दे बसंती का डायलॉग "कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है "ही सुना देते जब किरन ने आप से देश छोड़ने की ये बात कही थी....
आप ने निराश किया आमिर... आज लैपटॉप से “रंग दे बसंती” को डिलीट मारने का मन कर रहा है | आप ने सत्यमेव जयते बना कर जितना किया धरा था आप के स्टेटमेंट से उस पे पलीता मार दिया | आप बड़े लोग है कहीं भी आ जा सकते हैं पर मुझे वाकई डर रहीम..रहमान ..सुल्तान चचा का लग रहा है कि उन की ज़िन्दगी पर आप की कही बात का क्या असर होगा...
आप तो खैर मुझे जानते नहीं है फिर भी आखिर में चिट्ठी लिखने वाला अपना नाम तो लिखता ही है
बिमल रतूड़ी   
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एक मुसाफिर और सराय

मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं तुम्हारी शादी में आऊंगा , तय भी था मेरा न आना पर मैं मजबूर हुआ रिया की खुद की कसम देने से...समझाया भी उसे कि कितना मुश्किल है मेरे लिए वहां जाना...पर उस ने कहा बातें बहुत पुरानी है और कभी सुखी हुई जड़ों को पानी दिखाने से वो हरी नहीं होती...
रिया के बातों के जवाब नहीं थे मेरे पास और इतनी हिम्मत भी नहीं कि उस की दी कसम तोड़ दूँ ...
दिल्ली से टवेरा में रात का सफर कर के सुबह शिमला पहुँचे तुम्हारे बताये हुए गेस्ट हाउस में बैग डाला और रिया सीधे ही तुम्हारे घर हो ली आखिर उस की बेस्ट फ्रेंड की जो शादी थी कोई भी रश्म कोई भी रिवाज़ को वो छोड़ना नहीं चाहती थी ।
मेहँदी की रात थी आज , तुम्हारे हाथों और पांव में मेहँदी लगी थी । कॉलेज के दिनों में बातों के पुलिंदों में एक बात यह भी थी क़ि तुम्हारे हाथों में मेरे नाम की मेहँदी लगेगी, पर वक़्त कहाँ किस्सागोहि पे यकीं करता है उसे कुछ और ही मंजूर था और यही है कि तुम सज धज के हाथों में किसी और के नाम की मेहँदी लगाये हो और मैं....तुम्हारी शादी का एक मेहमान ...

 तुम बहुत सुन्दर लग रही हो...  मैंने कहा... और तुम ने डबडबाई हुई आँखों से कुछ वक़्त एक टक देखा मुझे...काश तुम्हे मैं गले लगा सकता... तुम्हारी पीठ पे थपथपाया...और तुम्हे जाने को कहा क्योंकि सब तुम्हारा इन्तजार कर रहे थे... तुम्हारी डबडबाई आंखो के सवाल मुझे पता थे , पर मेरे पास उन सवालों के आज भी जवाब नहीं हैं । ये रात गीत संगीत में ही खत्म हो गयी मैं भी जल्दी गेस्ट हॉउस में आ गया था , एक पैग लिया... शराब कौन सी थी पता नहीं... दो कड़वे घुट एक साथ ले रहा था मैं ...एक महबूबा की शादी का और खुद इस शराब की कड़वाहट ...कौन ज्यादा कड़वा है ..इस के जवाब खोजते कब नींद आ गयी पता ही न चला...

अगले मेरी सुबह काफी लेट हुई ,फोन को देखा तो रिया की 18 मिस्ड कॉल थी ...उफ्फ्फ ...डाँट खाने के लिए खुद को तैयार कर के रिया को फोन लगाया तो उस ने फ़ोन काट दिया, उस के गुस्से को मैं जानता था पर थोड़ी देर में मोबाइल पे रिया का मैसेज आया ...तैयार रहना तुम्हे मुझे और तुम्हें ब्यूटी पार्लर ले जाना है ..उफ्फ मैं तुमसे अकेले में नहीं मिलना चाह रहा था पर मुझे सच में नहीं पता  ज़िन्दगी बार बार मुझे ऐसे चौराहों पे क्यों लाकर खड़ा कर देती है ?

दिन की 3 बजे के करीब तुम मैं और रिया पार्लर के लिए निकले, एक तरफ रिया की बातें बंद नहीं हो रही और दूसरी तरफ मैं खुद के कई सवालों से जूझ रहा था , तुम्हारी आँखों के सवाल मेरे जहन में अब भी ज़िंदा है और कब तक रहेंगे पता नहीं ... जाते वक़्त खामोश ही रहा मैं ..
जब तुम पार्लर से बाहर आई तो यकीं कर पाना मुश्किल था तुम ऐसे रूप में मेरे सामने थी जिस की सपने में भी कल्पना मैंने नहीं की थी, खुबसूरत कहना तुम्हे उस वक़्त कम आंकने जैसा था...मुस्कुरा दिया तुम्हें देख कर बस्स....

तुम कार में बैठ चुकी थी रिया को पता नहीं क्यों वक़्त लग रहा था , हम दोनों की नज़रें मिली मैंने दोनों हाथों से उस के हाथों को पकड़ा और कहा माफ़ी मांगी मुझ में हिम्मत नहीं है कि मैं किसी का अभी सहारा बन सकूँ तुम्हे सराय बनना है और मुझे अभी मुसाफिर ही बने रहना है..मुसाफिर सराय से दोस्ती नहीं करते .. क्योंकि उन्हें उस सराय को छोड़ एक दिन  आगे बढ़ जाना है... तुमने कहा जब पता था कि तुम मुसाफिर हो फिर इस सराय के इतने करीब क्यों आये...
इतना कह के दोनों के हाथों की जकड़न ढीली छूट गयी ...रिया भी आ चुकी थी तब तक ...और सीधे ही गाडी घर को मोड़ ली ..

तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ा और मैं गेस्ट हॉउस में चेंज करने आ गया..लेट तक रुका ताकि तब तक बारात गेट तक पहुँच जाए ।

जब मैं आया तब तक बारात अंदर आ चुकी थी ,काले सूट में तुम्हारा राजकुमार अच्छा लग रहा था..जलन नहीं थी उस से पता नहीं क्यों.. जितना बताया था तुमने उस के बारे में तो सुकून था कि तुम अच्छे घर जा रही हो...

वरमाला के बाद फेरे थोडा भारी गुजरे मुझ पे और उस के तुम्हारी मांग पे सिंदूर भरने के बाद पता नहीं क्यों अपने आँसू रोक नहीं पाया मैं...रिया बगल में बैठ के सब देख रही थी उस ने भी कुछ नहीं कहा और न ही रोका मुझे...दुःख था मुझे तुमसे दूर जाने का पर तुम्हे पाना नहीं चाहता था मैं...

सुबह के तकरीबन 6 बज रहे थे मैंने रिया को चलने को कहा बैग पहले ही रखवा चुका था गाडी में...

हाथ मिलाया तुम्हारे पति से जब तुमने उसे दोस्त कह के मेरा परिचय दिया दोनों को ख़ुशी जीवन की शुभकामनाएं दे कर पलट गया... एक नयी राह पे...

रास्ते भर काफी कुछ सोच रहा था और खुद पे यकीं करना भी मुश्किल हो रहा था कि मैंने ये पल इतनी आराम से गुजार लिया...आराम तो नहीं पर कोई गम नहीं है तुमने अपनी राह चुनी और मैंने अपनी....तुम मेरी ज़िन्दगी का वो ए सपना थी जिसे मैं पाना नहीं चाहता था पर कभी खोना भी नहीं चाहता था.... पर सपने कहाँ सच होते हैं...

और तभी रेडियो से गाना बजा...
शामें मलंग सी ...रातें सुरंग सी...
बागी उड़ान पे ही ना जाने क्यों...
इलाही मेरा जी आये आये...
इलाही मेरा जी आये आये...

और गाडी शिमला की सर्पीली रोड पे नीचे उतर रही थी..शायद लग रहा था ज़िन्दगी का एक रिश्ता भी एक असफल मुकाम के बाद नीचे उतर रहा है...


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अजनबी के नाम पाती : दुनिया की खूबसूरती और विरोध की आवाज़


हेल्लो अज़नबी
कैसी हो?क्या चल रहा है ज़िन्दगी में?
बहुत दिन हो गए थे तुम से बतियाये हुए तो आज देर रात मन हुआ तुम्हे ख़त लिखने का...
दुनिया में अलग अलग तरह के लोग होते हैं पर कुछ एक लोग होते हैं जो नज़रों में रहते हैं हरवक्त । एक आम इंसान की नज़र से देखूं तो पाता हूँ कि ये सब वो जान बुझ कर करते हैं पर अगर उनके जूतों में पांव ड़ाल कर देखूं तो समझ बनती है कि उन का नजरिया ही अलग है चीजों को देखने का ,उसे बिल्कुल फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप उस के बारे में क्या सोचते हैं?
वो दुनिया को एक कैनवास की तरह देखते हैं और इंसान को कूची और इंसानियत को रंगों की तरह और इन सब के साथ वो सबसे अच्छी पेंटिंग बनाना चाहते हैं और जब भी कोई इस पेंटिग बनाने में कोई अड़चन डालता है या कोशिश करता है तो वो आवाज़ उठाते हैं।
"प्रतिरोध की आवाज़""विरोध का स्वर" तरीका कुछ भी हो सकता है उन का|
और सबसे मजेदार होती है आम आदमी की प्रतिक्रिया ...अरे पहले काहे नहीं विरोध किया?
जरूर इन का काम कुछ रुक गया होगा...ब्ला...ब्ला...ब्ला...
विरोध का कोई वक़्त,तरीका नहीं होता और ये उस आदमी के ऊपर है कि वो कैसे अपना विरोध जताता है...
लड़ाई कभी किसी व्यक्ति केंद्रित नहीं रहती उन लोगों की ,मतभेद वैचारिक है तंत्र को सुधारने के लिए..उस खूबसूरत इंसानियत के रंगों को बचाने की जद्दोजहद है ये सिर्फ...
पर मुझे एक बात और भी लगती है आम लोग भी उस पेंटिंग का मुख्य हिस्सा हैं तो वो ख़ास लोग जो इस दुनिया को एक सुन्दर पेंटिग में बदलना चाहते हैं वो उन लोगों के और पास जाएँ और अहमियत समझाएं इंसानियत के अलग अलग रंगों की ताकि सारे लोग इस दुनिया को खूबसूरत बना सकें और अपने विरोध के स्वर को भी बल दे सकें उन लोगों के खिलाफ जो रोक रहे हैं इस दुनिया को खूबसूरत बनने में...
आज के लिए इतना ही..जल्द ही बात करेंगे फिर....
तुम्हारा
जज्बात-ए-बिमल

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“चंद लोगों” के नाम ख़त


मेरे प्यारे “ चंद लोग ”
कैसे हो तुम ? उफ्फ बस्स बस्स समझ गया मैं कि तुम परेशान हो कि मैंने तुम्हारा वो नाम क्यूँ नहीं लिखा जिस नाम से तुम्हे सब जानते है पर ये ख़त मैं उस सारी बिरादरी को लिख रहा हूँ जो उस “चंद” लोगों में आती है और पता उस चंद लोगों की न कोई जाति है न धर्म न ही उस में लिंग भेद है क्यूंकि वो सिर्फ चंद लोग हैं...
कुछ एक किस्से कहानियां हैं जो तुम्हे सुनानी हैं
कुछ एक दिन पहले एक दोस्त से बात हो रही थी उस ने कहा यार ये एन.जी.ओ. वाले सारे बहुत घटिया लोग हैं, सारे के सारे पैसा खाते हैं कोई कुछ काम नहीं करता सब फण्ड के हेर फेर का खेल है | मैंने उसे कहा यार कितने टाइम से तुम इन एन.जी.ओ. वालों से जुड़े हो? उस ने कहा 1 साल एक एन.जी.ओ में काम किया था | दूसरा सवाल मैंने किया यार तुमने कितने एन.जी.ओ. में घूमा हैं ? उस ने जवाब दिया घूमा तो नहीं पर मैं सब जानता हूँ | (यहाँ पर पहली कहानी ख़त्म होती है...)
एक दोस्त से बात हो रही थी तो वो हाई प्रोफाइल स्कूल में टीचर हैं उन्होंने मुझ से बोला बिमल तुम फालतू ही गाँव में अपनी ज़िन्दगी ख़राब कर रहे हो ये सरकारी स्कूल न कभी सुधरे थे न कभी सुधरेंगे ? वहां के टीचर कभी कुछ नहीं करते ..वो मैडम होती हैं वो सिर्फ स्कूलों में स्वेटर बुनती है बाकी कुछ नहीं करते | मैंने उन से पूछा तुम कभी सरकारी स्कूल गयी हो ? जवाब न में मिला दूसरा सवाल किया मैंने कभी किसी मैडम को स्वेटर बनाते खुद देखा है ? जवाब मिला नहीं खुद तो नहीं देखा पर मैंने सुना है |(यहाँ पर दूसरी कहानी ख़त्म होती है...)
जेंडर पर हो रही एक कार्यशाला में एक युवा ने सवाल किया कि महिलाएं बहुत से कानूनों का गलत फायदा उठाती हैं और कई झूटे आरोप भी लगाती हैं और इस बात को साबित करने के लिए टाइम्स ऑफ़ इण्डिया अखबार में छपी किसी रिपोर्ट का हवाला दे रहे थे | मैंने सवाल किया कभी किसी बलात्कार लड़की से मिले हो ? उस ने सर न में हिलाया | मैंने फिर पूछा कभी किसी ऐसी महिला से मिले हो जिस ने जूठे आरोप लगा कर सब कुछ हड़प लिया हो और ऐश से अपनी ज़िन्दगी काट रही हो ? ? जवाब मिला नहीं खुद तो नहीं देखा पर मैंने सुना है |(यहाँ पर तीसरी कहानी भी ख़त्म होती है...)
अब तुम्हे ये लग रहा होगा कि ये किस्से कहानियां मैंने तुम्हें क्यूँ सुनाई ? ऊपर तीनों कहानियों में कुछ एक चंद लोग थे जो कभी उन हालातों से नहीं गुजरे पर उन्होंने फिर भी एक भारी भरकम विचार बना लिया है कि ऐसा ही होता है सब जगह पहली कहानी में वालंटियर स्तर पर काम करने वाला एक बंदा सारे एन.जी.ओ. सिस्टम को गलत ठहरा रहा था दूसरी में कभी सरकारी स्कूल न देखे हुए उस सिस्टम में कभी न आने वाले बदलाव के बारे में बता रही थी और तीसरे में महिला मुद्दों की A..B..C..D भी न जानने वाले सारी महिलाओं को झुटा ठहरा रहे थे | कितना आसान था ये सब....
अब मेरे प्यारे “चंद लोगों” मैं तुम्हे जवाब देता हूँ तुमने तो सिर्फ एक वाक्य बोला पर तुम्हे कुछ भी पीछे की कहानियों का पता नहीं है तुम्हे नहीं पता कि कितना मुस्किल है किसी भी महिला के लिए सिर्फ इतना रिपोर्ट करना कि मेरे साथ कुछ गलत हुआ है | तुम्हे खबर नहीं है सरकारी स्कूलों के सिस्टम का और न ही उन एन.जी.ओ. वालों का जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी खपा दी लोगों के बीच निस्वार्थ भाव से काम करने में |
ऐसे ही कुछ कह देना आसान होता है बहुत आसान पर कितना मुस्किल होता है खुद को उस जगह पर रख के देखना... किन्ही एक दो लोगों की हरकत के लिए हम सब को कभी जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते ...
बातों से पब्लिसिटी पाना बहुत आसान है पर गौर करो अपनी बातों पर कहीं तुम्हारी कही किसी बात का किसी की ज़िन्दगी में बहुत बुरा असर न हो जाए और जब तक तुम उस बात पर अपनी समझ बना पाओ तब तक सामने वाले की ज़िन्दगी ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी हो ...
तो उम्मीद करता हूँ “चंद लोगों” से कि कोई भी बात कहने से पहले ये जरुर सोच लें कि जो बात कह रहें हैं उस का असर क्या हो सकता है ...और मुझे पता है आप सिर्फ चंद लोग ही है क्यूंकि दुनिया में औरों को काफी काम है गपियाने के अलावा ...
खैर
मैं तुम्हारा वही ..
जज्बात-ए-बिमल
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सिर्फ मैं ही क्यूँ ?

पत्रकारिता के कॉलेज में जब सर न्यूज़ या आर्टिकल लिखना सिखाते थे तो कहते थे कि पहले कोई भी न्यूज़ या आर्टिकल लिख दो और फिर उस को एक दो बार पढ़ कर उसे फिर एक अच्छा सा टाइटल दो और अधिकतर में करता भी यही हूँ पर जिस पर आज मैं लिख रहा हूँ ये सवाल मेरे दिमाग में कई बार आता था और ऐसा नहीं है कि ये मेरे दिमाग में जन्मा हो इस का सीधा संबंध लोगों के बीच जा कर उन की कहानियां सुन कर,सेमिनारों में सवाल जवाबों को देख कर और किताबों की दुनिया के कई चक्कर मार कर कौंधा है “सिर्फ मैं ही क्यूँ ?” 

                          

हाँ “सिर्फ मैं ही क्यूँ ?” सवाल बहुत बड़ा है और तक़रीबन बात करूँ तो हम सब की जिंदगियों को छूता है पर सब कुछ समेटना शायद संभव नहीं है तो एक बड़ा मुद्दा युवा ले रहा हूँ और बातचीत उसी के आसपास करूँगा | कुछ दिनों पहले एक काउंसलर से मिला था उस से में पूछा कि जब तुम काउंसिलिंग करते हो तो सब से ज्यादा मुश्किल हिस्सा क्या होता है तो उस ने जवाब दिया सब से ज्यादा मुश्किल हिस्सा होता है किसी के दिमाग से ये सवाल ही हटा पाना कि “ये मेरे साथ ही क्यूँ हुआ” और ये काफी बड़ी वजह है जिस से किसी के ठीक हो जाने में काफी वक़्त लग जाता है|

कईयों के साथ छेड़खानी,जबरदस्ती,बलात्कार जैसी घटनाएँ होती हैं जिन का असर उन की जिंदगियों पर ताउम्र रहता है और हमारे सामाजिक तानेबाने से उन के अन्दर एक भावना आ जाती है कि शायद इस के लिए कहीं ना कहीं जिम्मेदार थी मैं और यह बात केवल महिला मुद्दों तक ही सम्बंधित नहीं है रिश्तों में धोखा मिलने और परीक्षाओं में सही प्रदर्शन ना कर पाने के बाद भी यही हीन भावना धर करने लगती है | और जिन लोगों को लगता है यह भावना महिलाओं में ज्यादा होती है तो आप गलत है पुरुषों में भी यह समस्या आम है | मैं समस्या के डिटेल में नहीं जा रहा क्यूंकि शायद अपने आसपास होने वाली इस बात से आप भी अच्छे से रूबरू है |

अगर मैं समाधान की बात करूँ तो इसे मैं एक सच्ची घटना से कनेक्ट करूँगा, एक हंसती खेलती लड़की थी रिया स्कूल से कॉलेज तक टॉप करने वाली सब की चहेती थी,काफी बड़े ख्वाब थे उस के और उन्हें पाने के लिए काफी मेहनत भी करती थी,एक इंटरनेशनल फाउंडेशन द्वारा उसे आगे की पढाई अमेरिका मे करने के लिए स्कोलरशिप मिली ये उस के सपनों के पुरे होने जैसा था पर शायद कहानी को किसी और मुड़ना था एक दिन कॉलेज से रिक्सा में आते हुए किसी ने उस के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया,चेहरे का काफी हिस्सा जल गया था और किसी तरह उस की जान बची | चार पांच महीनें इसी में लग गए जिस वजह से वो अमेरिका नहीं जा पाई| जिस दौरान वो अस्पताल में थी तो उस से मिलने कई लोग आये और काफी कुछ बातें की जो किसी घटना के बाद हमारा समाज करता ही है और इन बातों को सुनने के बाद जब उस ने इन बातों पर गौर किया तो पाया कि इन बातों का उस से कोई संबंध ही नहीं है और ना ही वो इस के लिए कहीं भी जिम्मेदार है, और उस की क्षमताओं में भी कोई कमी नहीं आई है और उस ने इस बात को एक सामान्य घटना मान कर अपनी ज़िन्दगी में कुछ नए सपने संजों लिए और उन्हें पाने में लग गयी | आज वो अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर है कई बड़े सपनों के साथ वो वापस भारत आने की सोच रही है |

रिया की कहानी कई सवालों का जवाब है कि जब भी हमारे साथ कोई असामान्य घटना होती है तो हम ये कुंठा ना पाल ले कि इस की वजह मैं हूँ,
आप किसी भी तरह इस घटना के जिम्मेदार नहीं है यह घटना किसी के साथ भी हो सकती थी और आप आंकड़े उठा के देखिये लाखों लोग हैं दुनिया भर में, पर इस घटना के बाद चाहे भले ही आप ने अपनी ज़िन्दगी को रोक लिया हो पर क्या बाहर दुनिया रुक गयी? एक पेड़ की जब कोई डाली टूट जाती है तो क्या उस पर नयी डाली नहीं आती ? बस्स नयी शुरुवात करें क्यूंकि नया कुछ भी करने का कोई स्पेशल वक़्त नहीं होता .... “जब जागो तभी सवेरा”  

अब आयें उन बातों पर जिन में हम असफल हो जाते हैं चाहे तब वो रिश्ता हो या कोई परीक्षा, रिश्तों हार जीत से परे होते हैं और किसी ने आप को धोखा दे दिया है तो शुरुवात तो रिश्ता सुधरने की कोशिश से करें पर अगर रिश्ता ना सुधरे तो आगे बढ़ने में ही भलाई है क्यूंकि किसी एक की वजह से अपनी दुनिया आप रोक लें ये उन लोगों के लिए बुरा होगा जिन की ज़िन्दगी का आप अहम् हिस्सा है और किसी और के हो ना हों आप अपनी ज़िन्दगी यूँ ही थोडा ना रोक लेंगे .. परीक्षा में असफल होना शायद हमारे लिए एक सीख है कुछ एक देर अपने झाँकने के लिए कि हमारे अन्दर क्या कमी रह गयी और कैसे उस में सुधार किया जा सकता है क्यूंकि सच मानिये “
किसी भी ठोकर के बाद हमेशा आदमी आगे ही गिरता है कभी पीछे नहीं आता” तो ठोकर खाने से मत दरिये क्यूंकि गुंजाईशें हमेशा रहती है सुधार की |

 और आखिर में यही कहूँगा जब दिल धडकता है तो ई.सी.जी मॉनिटर में दिल की धड़कने ऊपर नीचे ऊपर नीचे चलती है पर जब कोई मर जाता है तो वो धड़कन सीधी रेखा में बदल जाती है , यही ज़िन्दगी भी है ज़िन्दगी में आये उतर चढ़ाव दिखाते हैं हम जिंदा है और आगे बढ़ रहे हैं |

                          

हर चीज के लिए आप ज़िम्मेदार नहीं हैं और जो आप के साथ अभी हो रहा है वैसा फील करने वाले आप दुनिया के पहले इंसान नहीं है तो वक़्त क्यूँ बरबाद करना ?? आगे बढ़ो सिर्फ आगे बढ़ो ....क्यूंकि वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता ...किसी के लिए नहीं....   
                                           
   
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मैं और गाँधी फ़ेलोशिप


हेल्लो दोस्तों
आज मुझे आप के सामने खड़े होने में बड़ा गर्व महसूस हो रहा है और इस की दो वजह हैं एक वजह तो ये कि मुझे हमेशा से ही उन युवा चेहरों से मिलने की इच्छा रहती है जिन के भरोसे कल हमारा देश चलने वाला है मैं बार बार उस उर्जा को महसूस करना चाहता हूँ इस लिए आप सब के बीच आया हूँ और दूसरी वजह कि उस रास्ते के बारें में आप सब को बताना जिस पर मैं चल रहा हूँ और हर बार गौरवान्वित महसूस करता हूँ| मेरे परिचय में मैडम ने आप को बताया कि मैं गाँधी फेलो हूँ जो राजस्थान के स्कूलों में काम कर रहा है |

क्योंकि मैं भी आप जैसे ही कभी स्कूल का छात्र रहा हूँ और स्कूलों में काम भी कर रहा हूँ तो पहला सवाल सब के दिमाग में यही आता है आखिर ये “फेलो” कहते किसे हैं ? और ये काम क्या करता है ?
आप लोग विद्यार्थी हैं और पढ़ रहे हैं और आप के शिक्षक आप को पढ़ा रहे हैं यानि वो नौकरी कर रहे हैं और पढ़ाई और नौकरी के बीच की एक कड़ी होती है जिसे “फ़ेलोशिप” कहा जाता है,यानि एक स्पेशल विषय पर जब पढ़ाई की जाति है और इस पढ़ाई के दौरान आप को कुछ सुविधाएँ भी दी जाती हैं उसे फ़ेलोशिप कहते हैं
 मैं जिस फ़ेलोशिप में हूँ उस का नाम “गाँधी फ़ेलोशिप” है| और इस में हम खुद पर यानि अपनी स्किल्स पर काम कर रहे हैं और हमारी स्किल्स  को डेवलप करने का जरिया बनाते हैं हर फेलो को दिए गये पांच स्कूल और उन स्कूल की कम्युनिटी| हम पांच स्कूल,उन स्कूलों के हेड मास्टर,अध्यापक,बच्चे और उन के पूरे गावं के साथ जुड़ के काम करते हैं |
अगर हम आम जिंदगियों को देखें तो हमारी सोच हमारे सपने तो बहुत बड़े बड़े होते हैं पर जब उन बड़े सपनो को सच करने की बात आती है तो हम अपने कदम पीछे ले लेते हैं और इस की सबसे बड़ी वजह ये है कि हम कभी अपने कम्फर्ट जोन से कभी बाहर नहीं आना चाहते और फ़ेलोशिप बार बार हर बार हमारे कम्फर्ट जोन को तोड़ कर हमें आगे बढ़ने में मदद करती है और बड़े सपनों को सच करने की ताकत देती है |
एक लाइन कहीं पढ़ी थी मैंने हमारे देश में नेताओं की कमी नहीं है अगर कमी है तो सही नेतृत्व की और गाँधी फ़ेलोशिप युवाओं के बीच एक नेतृत्व विकास कार्यक्रम है |
मीडिया की पढ़ाई करने के दौरान मैं एक सामाजिक बुराई “युवाओं के बीच बढती आत्महत्या की प्रवित्ति” के काफी नजदीक आया था इस टॉपिक पर गहन अध्ययन के बाद मुझे लगा कि मुझे इसी टॉपिक पर आगे काम करना है मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहता पर कैसे अपने कार्यक्रम को एक बड़ा स्वरुप दिया जाए इस की मुझे A..B..C..D… भी नहीं पता थी तब मैंने अपने अन्दर स्किल्स डेवलपमेंट के लिए गाँधी फ़ेलोशिप की राह चुनी |
हमारे फील्ड विजिट,स्कूल सेशंस,फ़ेलोशिप सेशंस हमारे अन्दर वो ताकत पैदा कर रहे हैं जिस से मुझे अपनी ज़िन्दगी में हजारों लाखों लोगों की जिंदगियों तक पहुँचने और उन की जिंदगियों को को बदलने में मदद मिलेगी |
हमारे साथी फेलो देश के अलग अलग कों से हैं और अलग अलग एजुकेशनल बैकग्राउंड से हैं अगर हम सब में कुछ समान है तो वो है इस दुनिया को बदलने के लिए बड़े सपने देखना और उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करना| और अपने सपनों के लिए वो अपने अन्दर काफी बदलाव ला भी रहे हैं अपने कम्फर्ट जोन को बार बार तोड़ रहे हैं |
दूसरों को जानने से पहले ज्यादा जरुरी है खुद को जानना और खुद को समझना क्यूंकि अगर मैं ये सवाल करूँ आप से कि खुद से पूछिए कि “मैं कौन हूँ ?” तो मैं बता सकता हूँ कि 99.99% लोगों के पास इस सवाल का जवाब नहीं होगा | खुद को अच्छे से जानना ही गाँधी फ़ेलोशिप का मुख्य उद्देश्य है |
शायद दो साल बाद मैं “मानसिक स्वास्थ्य” पर काम कर रहा हूँगा और इस विषय पर अच्छे से काम कैसे किया जायेगा मैं अभी सीख रहा हूँ |
बहुत कम मंच हैं जो आप को खुद को पहचानने और आप के अपने सपनों को सच करने की ताकत देते हैं और मुझे ख़ुशी है मैं एक ऐसी ही जगह पर हूँ |
अपने सपनों को जीना सीखो बंद आँखों से जरुर सपना देखो पर खुली आँखों से उन्हें पूरा करने के लिए जी जान लगा दो आप के पास यही वक़्त है अपने सपनों को पूरा करने का....

और आखिर में आप सभी का धन्यवाद मुझे उम्मीदें नज़र आ रहे हैं आप सभी के चेहरों पर उम्मीद है आप अपने देश की उम्मीदों पर खरा उतरेंगे....       
धन्यवाद


(ये भाषण मेरे द्वारा एक स्कूल के बच्चों के लिए लिखा गया है )
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मैं वो और हमारा रिश्ता

वो बहुत सुन्दर थी और मैं दूर से सूप की चुस्कियां लेते हुए उसे डी.जे. पर डांस करते हुए देख रहा था, मौका मेरे एक दूर की रिश्तेदार की बेटी की शादी का था| काफी देर से उसे देख रहा था तो शायद उसे इस बात का एहसास हो गया और अचानक हमारी नज़रें मिली और दोनों ने ही नज़रें चुरा ली, मेरा अब उसे छुप छुप के देखने का दौर शुरू हुआ, और मैंने गौर किया कि अब वो भी मुझे देख रही थी| शादी की रश्मे चल रही थी जयमाला हो चुकी थी बाहरी मेहमान खाना खा कर निकल चुके थे| मैं मुंबई से सेमेस्टर ब्रेक में घर आया था तो मम्मी पापा के साथ दिल्ली इस शादी में चला आया, अब दूल्हा दुल्हन के खाने का दौर चला मैंने देखा कि वो लड़की दुल्हन के साथ ही खाना खा रही थी मेरी मौसी की बेटी ने मुझे भी खाना खाने बैठा दिया, और इत्तेफाकन मैं उस के बगल में बैठा और पहली ढंग की सोशली स्माइल हम दोनों ने आपस में पास की| खाना खाने के बाद फेरों की रश्म के लिए अभी वक़्त था तो हम सब दूल्हा दुल्हन की तरफ वाले आपस में बैठ पर मस्ती मार रहे थे कि अचानक मेरा फोन बजा वक़्त तक़रीबन एक बज रहा था, दोस्त का था और उसे कुछ मदद चाहिए थी तो मैं फोन सुनने अलग आया फोन सुन कर जब मैं वापस आया तो देखा उस ग्रुप में वो नहीं थी नज़रें इधर उधर दौड़ई तो देखा कि वो अगल से बैठी हुई थी मैंने भी वापस ग्रुप में जाना ठीक नहीं समझा और मैं उस की तरफ चल पड़ा, मैंने कुर्सी ली और उस के बगल में आकर पूछा – बैठ सकता हूँ उस ने कहा- हाँ स्यौर
और थोडा बहुत बातचीत का दौर शुरू हुआ उस ने पूछा कि तुम मुझे छुप छुप के देख रहे थे, तो मैंने भी कहा तुम्हारी नज़रें भी हमेशा उस तरफ कुछ खोज रही थी जिस तरफ मैं बैठा होता था... और इसी बात पर दोनों हंस पड़े...
दोनों की सिर्फ नज़रें आपस में नहीं टकराई थी बल्कि दिल में भी कुछ सिग्नल गये थे और रात भर फेरे देखते देखते और उस के आगे पीछे का वक़्त हम दोनों ने साथ गुजारा और एक दुसरे को समझने की कोशिश की पर जहाँ लोगों को एक दुसरे को समझने में पूरी ज़िन्दगी लग जाती है वहां एक रात में हम दोनों कौन से कद्दू में तीर मार देते? खैर हम दोनों ने ही एक दुसरे के साथ सुहाना वक़्त गुजारा..

और सुबह हो गयी विदाई की तैयारियां होने लगी, मेरे मम्मी पापा भी गेस्ट हाउस से दुल्हन के घर पर आ गये थे और मैं थोडा पापा से मिलने गया ये पूछने कि वापस जाने का क्या प्लान है ?
मैं पापा के साथ खड़ा ही था कि एक अंकल पापा से मिले, दोनों आपस में गले मिले और मैंने भी इन्फोर्मल्ली नमस्ते कर दिया, तो पापा ने टोक दिया रवि बेटा पांव छूओ मौसा जी के, ये तुम्हारे गोरखपुर वाले मौसा जी है मौसी भी आई है.. तो मैंने पांव छुवे और तभी एक औरत को मम्मी ने कहा ये मौसी है तो मैंने उन्हें भी नमस्ते किया| पापा ने उन से घर वर के बारे में पूछा और उन के बच्चों के बारे में भी और कहा कि अब तो डिम्पी बड़ी हो गयी होगी तो मौसा जी ने जवाब दिया हाँ काफी बड़ी हो गयी है आप ने तो बचपन में ही देखा था और उन्होंने आवाज़ दे कर एक लड़की को बुलाया और उसे कहा कि डिम्पी ये तुम्हारे दिल्ली वाले मौसी मौसा जी है और ये उन का बेटा रवि....

शिट ... व्हाट द फ़क ये है डिम्पी जिसे पूरी रात मैं पटाने की कोशिश कर रहा था वो मेरी कजन है..
पूरी रात की फेंटेसी उतर गयी, डिम्पी का चेहरा भी उतर चूका था.. हम दोनों एक दुसरे से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे... अब मुझे इस शादी से जल्द से जल्द घर निकलना था.. गिल्ट हो रहा था अपनी इस हरकत का...फिर अगले ही पल ध्यान आया कौन सा मैं वन साइडेड कर रहा था वो भी तो लाइन दे रही थी...
पर मुझे लगा कम से कम एक आखिरी बार तो मिल ही लूँ डिम्पी से, वो किनारे खड़ी थी दुल्हन की विदाई हो रही थी मैं उस के बगल में जा कर बोला सॉरी यार मुझे पता नहीं था... अच्छा जी कल रात तो बड़े स्टड बन रहे थे और अब सॉरी... वो बोली...  सॉरी बोल तो रहा हूँ मुझे पता नहीं था और तुम भी तो लाइन दे रही थी... वो मुस्कुराने लगी और उस ने भी कहा सॉरी .... भैय्या....

दर्जनों चप्पलों से सूत दिया हो मुझे ऐसा फील आ रहा था उस के भैय्या कहने से ... अब रुकने की हिम्मत नहीं बची बाय कहा उसे ..तब तक दुल्हन भी विदा हो चुकी थी घर भी खाली हो रहा था मैंने भी अपना सामान कार में रखा मम्मी पापा चलती कार से उन मौसी मौसा और डिम्पी को बाय कर रहे थे पर मुझ में तो पीछे पलटने के बाय करने हिम्मत भी नहीं बची थी...   
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