तेरा अस्तित्वा तेरी क्या पहचान है ???


है सुलगता कौन सा
  वो सवाल है,
है ये उफनता जोश या सिर्फ बवाल है,
कौन सी इबारत वो बेजा लड़की लिख गयी,
जिस से  पुरे देश में ये भूचाल है ||

था क्या ये अन्याय पहला दुनिया में?
फिर क्यूँ जनता इतनी क्यूँ हैरान हैं?
अब चिंगारियां क्यूँ शोला आज बनने लगी?
क्यूँ सड़क पर जनता आज परेशान है||

सुनी नहीं कहानी किसी ने अहिल्या की,  
क्यूँ आज भी इरोम की गली सुनसान है,  
है नया कुछ भी नहीं इस दुनिया में, 

क्या तू कथा द्रौपदी से अनजान है||

पितृ सत्ता नहीं है कोई पहाड़ी गावं 
  जिस की अब न कोई पहचान है
  पितृ सत्ता ये तो वो वट वृक्ष है...
जो हर पल छीनता नारी की हर पहचान है||

जो लिख गया सो लिख गया,
क्यूँ ढूँढती तू नारी अपनी पहचान है,
हजारों दामिनियाँ मर गयी
रूह उन की अब भी न्याय से अनजान है||

कब तक सुलगेगा ये सवाल 
  नारी आज भी  तेरा अस्तित्वा तेरी क्या पहचान है ??? 
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मेरे साफ़ कमरे की कहानी



कम्बल के ऊपर गिरा नेल कटर,
खिड़की की दीवारों पर चिपके खीरे के बीज,
परदे की राड पे लटके टूटे हुक,
खिड़की पर चिपकी दो चिट,
जिस में एक पर किसी के जाने की खबर,
और एक पर किसी के आने का संदेशा,
जमीन पर गिरा स्टेप्लर,
दिवार पर टेढ़ी तंगी तस्बीर,
आईने पे चढ़ी धूल की परत,
अधखुली किताबों की अलमारी,
फर्श पर पड़े स्याही के गहरे निशान,
किताबों के ढेर पर रखे चाय के पुराने कपों की मुस्कान,
दूसरे बिस्तर में पड़े मोबाईल चार्जरों का जाल,
टेबल में पड़ी लैपटाप,पेन और कई डाईरियां,
सामने दीवाल में रखी सरस्वती की मूर्ति,
चौतरफा लटकते मकड़ी के आशियाने,
ढूंढती हैं पवन कमरे में आने के बहाने,
आलमारी के ऊपर रखी अधखुली इत्र की शीशी,
दीवाल में लगी पुरानी फोटो याद दिलाती है किसी की,
बिस्तर में रखे धुले कुर्ते की नीची लुढ़की बाजू
फर्श पर लुढ़की इंडिया टुडे के आवरण में छपा कानून का तराजू,
कलमदान में वर्षों से पड़े कई बंद पेन,
इन सब के बीच मेरा सोचता अस्थिर चंचल मन,
ये है मेरे साफ़ कमरे की कहानी,
सिर्फ और सिर्फ मेरी जुबानी ||
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कुंवारी बिधवा



मिटटी,पत्थर,धूल इन्ही सब के बीच थी उस की ज़िन्दगी,
मजदूर जो थी वो...
दिन भर मेहनत करती,कभी किसी से कुछ ना कहती
न कोई आगे,न कोई पीछे, ना ही कोई दूर का कोई रिश्तेदार
होता भी क्यूँ? पैसा जो ना था उस के पास|
मैं छोटा था जब तब भी ज़िन्दगी उस की वैसे ही थी,
मेरी उम्र बढती गयी तब भी ज़िन्दगी उस की वैसे ही थी|
और आज मेरा बेटा छोटा है,पर उस की ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं|
न कोई श्रृंगार,न कोई लालिमा,न कोई ख़ुशी,
साल इतने बीते पर साड़ी के रंग तक में भी कोई बदलाव नहीं,
ज़िन्दगी भर मेहनत,सिर्फ दो वक़्त की रोटी के लिए
ना उस के घर कोई आता, ना कहीं जाते ही देखा मैंने उसे आजतक,
न कभी बीमार पड़ती,न कभी उस की दिनचर्या रूकती
सुना था मैंने शादी के तीन रोज में ही पति चल बसा
क्या नाम था उस का आज तक मुझे तो ये भी नहीं पता
नाम की उसे जरुरत ही नहीं पड़ी|
क्या करती नाम का ?  
न किसी को उस से मतलब रहता,न ही उसे किसी से मतलब रहता
मैंने तो ताउम्र उस के संघर्ष को देखा
पर अब उस के काम को मेरा बेटा देखता है
एक दिन यूं ही पूछ लिया उस ने
पापा उस औरत का नाम क्या है???
जवाब मेरे पास नहीं था,
पर पता नहीं कैसे मुहँ से निकल पड़ा
कुंवारी बिधवा     
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धूमिल उम्मीदें शहर बसाने की ...


ज़िन्दगी 
कीमत क्या है तेरी?
वजन क्या है तुझे में?
कैसे तुझ पे बिस्वास करूँ
चंद घंटों की बारिश और सब कुछ तबाह...
सारे घर तबाह... सारे आशियाने तबाह
किसी की माँ गायब है तो किसी के पिता
किसी के बच्चे की खबर नहीं 
किसी के सुहाग का कुछ न पता 
सरकारी पैसा.....
हा हा हा....
साले सरकारी भडवे...
इस तबाही के वक़्त भी अपना हिस्सा मांगते हैं
सड़के,मकान जमीन,खेत खलिहान 
सब गायब हैं 
सब कुछ बह गये....
मुझे नहीं पता कब दुबारा फिर शहर बसेगा
मुझे नहीं पता फिर कब इस चमन में फूल खिलेगा
 मुझे तो हंसी आती है
कैसे दम्म भरते हैं इस ज़िन्दगी का हम
कैसे गुमान करते हैं इस ज़िन्दगी पे हम
पर एक झटके में सब गायब
बची है तो आज भी कुछ जिंदगियां 
और फिर से नया शहर बसने की कुछ धूमिल उम्मीदें ....
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इस आधी रात में


इस आधी रात में 
जब कोई नहीं है साथ में
सिर्फ मै और मेरी तन्हाई...
अक्सर....
खामोश ही रहती है
कुछ न मुझ से कहती है....
सायं सायं मेरे कानो सिर्फ आवाजें आई हैं
ये भी तेरी यादों की परछाई है....
तुम होती...तो ये होता
तुम होती ...तो वो होता...
आज.....
तुम नहीं हो....तब भी जिंदा हूँ मै
जिंदा लाश तो नहीं....
खामोश बुत्त जरुर हूँ....
चाहतों के मायने थे क्या तेरे
कभी तो कुछ बताती 
कुछ तो मुझ को समझती 
समझता हूँ होशियार खुद को मै
पर ......
तेरे जज्बातों को न समझ सका 
तेरे इरादों को न समझ सका....
कोई नहीं चाहे भले ही....
कोई नहीं है साथ मेरे....
मुझे तो अब आदत हो गयी है....
और मै खुश हूँ ...
क्यूँ इस आधी रात में...
जब कोई नहीं है साथ में....
तेरे यादों की सायं सायं कानो में आज भी आवाज़ करती हैं.....
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फिर भी हिंद को बदलना है...


हिंद में है आग क्यूँ?
लुट रहा समाज क्यूँ?
मिट रहे ज़ज्बात क्यूँ?
बिक गया ईमान क्यूँ??
कोई तो मुझे बताये...

जल रही क्यूँ आज नारी?
बढ़ी क्यूँ भ्रस्टाचार की बीमारी?
क्यूँ बिक रही है डिग्री सारी?
कौन से कल की है ये तैयारी?
कोई तो मुझे बुझाये...    

लोग सब बेमान क्यूँ?
जनता भूखों परेशान क्यूँ?
नेता इतने हराम क्यूँ ?
और प्रशासन नाकाम क्यूँ ?
कोई तो मुझे समझाए....

पस्त है यूवा पीढ़ी सारी...
और मस्त है जनता सारी... 
राह क्या है अब हमारी?
कैसे अंधियारे कल की सवारी?
कोई तो मुझे दिखाए ...

मिल जाये जवाब अगर
दुबारा सोचना फिर मगर
चाहे कठिन है ये डगर
फिर भी हिंद को बदलना है.....
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ख़ुशी मुझे है...


ख़ुशी मुझे है की तुम ने अपनी ख़ुशी पाई है,
उस में तुम खुश हो और तुम्हारी पूरी दुनिया समाई है|
क्या हुआ जो मुझे मेरा प्यार नहीं मिल सका?
क्या हुआ जो मुझे तेरा साथ नहीं मिल सका,
गलती मेरी ही है इस में,
जो मै सोचा धरती आसमान को मिलाऊंगा,
आसमा से करूँगा बातें,धरती को चिढाऊंगा,
टुटा मेरा सपना चूर चूर आज हो गया,
फिर भी खुश मै हूँ कि तुम ने अपनी खुशियाँ पाई है,
जिस मै तुम खुश हो और तुम्हारी दुनिया समाई है|
  खुश हूँ मै, जो जिंदगी में तेरे उल्लास है,
भुला तो कब का दिया होगा,
क्यूंकि बिमल तो पुरानी बात है,
पर मै नहीं भुला पाया,
क्यूंकि तू ही इक जीने का सहारा है,
तेरे बिना बिमल आज भी बेसहारा है,
पर छोड़ इन बातों को, इन बातों का न कोई अब मतलब है
फिर भी खुश मै हूँ कि तुम ने अपनी खुशियाँ पाई है,
जिस मै तुम खुश हो और तुम्हारी दुनिया समाई है|
कर सको जो याद कभी,तो याद मुझे कर लेना
यादों के झरोखों से,कुछ यादें आँखों में भर लेना,
मुझे पता है उस वक़्त तेरी आँखों में आंसू आयेंगे,
जो तुझे तब भी मेरा प्यार,मेरी अहमियत बतायेंगे,
शायद तब देर हो जाये,जिंदगी का कारवां रास्ता बदल जाये,
पर छोड़ तब की तब देखेंगे,किसने सब कुछ पाया है
फिर भी खुश मै हूँ कि तुम ने अपनी खुशियाँ पाई है,
जिस मै तुम खुश हो और तुम्हारी दुनिया समाई है|
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