Thursday, September 07, 2017

भीड़ का हिस्सा बनके तुम अपनी मौत के लिए खुद जिम्मेदार होंगे !!!

पहले वो मेरे शहर में आये, लोगों को मारने लगे, 
मैंने कुछ नहीं किया ...

फिर वो मेरे मोहल्ले में आये,
मैंने कान बंद कर लिए...

फिर वो मेरी गली में आये,
मैंने आखे बंद कर ली...

जब वो मेरे घर में आये,
तो मुझे बचाने वाला कोई नहीं था !



द्वितीय विश्वयुद्ध की इस कविता से मैं तब रूबरू हुआ था जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन चल रहा था | इस कविता में कही बातें समाज का वो आईना है जिस पर पर्दा डाल कर हम उससे किनारा तो कर सकते हैं पर वो पर्दा कभी न कभी आईने से हटेगा और जब तक हम उस सच को समझें तब तक शायद बहुत देर हो जाए |

    गौरी लंकेश की हत्या एक अलार्म है | ये अलार्म पहले भी बजते आये हैं कभी राम रहीम केस को सामने लाने वाले रामचंद्र छत्रपति,कभी मलेशप्पा कलबुर्गी और कभी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से पर हम ध्यान नहीं देते क्यूंकि ये मुद्दे नहीं हैं |     
    
 इस बार अलार्म ज्यादा खतरनाक है | इस बात से नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ख़त्म हो रही है बल्कि इस बात की कि हमारा समाज बड़ी तेजी से वैचारिक शून्य भीड़ में बदलता जा रहा है | हम क्यूँ अपने मुद्दों के लिए नहीं सवाल करते ? कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर गोवाहटी तक हम लाखों मुद्दों से जूझ रहे हैं पर एक तंत्रगत ब्यवस्था के तहत हमें सोचने के लिए मजबूर किया जा रहा है कि हमारा धर्म खतरे में हैं और ये सब मुद्दे गौण हैं अभी हमें धर्म बचाना है |
    
किसान खेती छोड़ रह है , हमारी शिक्षा ब्यवस्था दुनिया में कोई स्थान नहीं रखती , देश के अन्दर गरीब आदिवासियों को गोलियों से भूना जा रहा है , बात बात पर गलियों में भीड़ उग्र हो कर किसी न किसी को मौत के घाट उतार रहे है , पर हम इन सब बातों को बहस के केंद्र में नहीं लाना चाहते |

       कौन है वो लोग जो इतनी उग्रता समाज में फैला रहे हैं ? कौन है वो लोग जो हर मौत को जस्टिफाई कर रहे हैं ? कौन हैं वो लोग जो समाज की सच्चाई सामने लाने पर गोलियों से भून रहे हैं ? कौन हैं वो लोग वो भारत माता की जय के नारे लगा कर औरतों को रंडी ,वैश्या,छिनाल लिख रहे हैं ?

        फेसबुक ,ट्विटर पर इतना लम्बा लम्बा कंटेंट कहाँ से आ रहा है ? कोई तो लिख रहा होगा और संस्थागत तरीके से लिख रहा होगा | घटना के बाद घंटे भर में कैसे फेसबुक और ट्विटर का नीलापन जज्बातों के उमाड़ से बहने लगता है ? अगर वो कंटेंट मैं और आप अपने नाम से नहीं लिख रहे तो वो गुमनाम कौन लेखक है जो इतना जहर अपने हलक से उगल रहा है और हम धडाधड उसे शेयर कर रहे हैं |
      
दोषी कौन है ? केंद्र सरकार या राज्य सरकार या हम खुद ? क्या हम जो सोशल मिडिया पर फैला रहे हैं क्या हम वही बातें अपने परिवार के साथ साझा कर सकते हैं ? अगर किसी लड़की को हम रंडी या वैश्या कह रहे हैं तो क्या हम यही शब्द अपनी माँ,बहन या बेटी के लिए सुन सकते हैं ? अगर नहीं तो हम दोगला ब्यवहार कर रहे हैं समाज में |
       
सरकारों को चुनने में समझदारी दिखाओ | क्यूंकि आज जो खुद को स्थापित करने के लिए साम दाम दंड भेद का सहारा ले सकते हैं उन्हें कल जरूरत पड़ने पर तुम्हें भीड़ से कुचलवाने में वक़्त नहीं लगेगा | 

      विचारों को मत मरने दो , उन्हें स्थापित करो ,सवाल करो, सवालों को ख़त्म मत करो , सवाल पूछने वालों को ख़त्म मत करो | भीड़ का हिस्सा मत बनो क्यूंकि आज तुम भीड़ से अलग होकर अपनी बात नहीं कही तो कल तुम्हारी कहानी सुनने वाला कोई नहीं होगा |  आज गौरी लंकेश थी कल तुम होंगे और तुम ये भी नहीं कह पाओगे कि मैंने कभी कुछ नहीं कहा क्यूंकि वो इसी लिए हो रहा होगा क्यूंकि तुमने कभी कुछ नहीं कहा |     

        



Sunday, August 06, 2017

राखी वाली चिट्ठी और बराबरी की तैयारी

प्यारी बहिन
हाँ तुझे बार बार सताने वाला और सिर्फ पीछे से तेरा ध्यान रखने वाला भाई तुझे आज सीधे ख़त लिख रहा है | मुझे कई बार लगता था कि ये बातें मैं तुझ से कहूँ ज़िन्दगी के अलग अलग वक़्त पर पर मैं कभी कह नहीं पाया इस लिए आज तुझे बहुत कुछ कह रहा हूँ |
मैंने तुझे बहुत बार छोटी छोटी बातों पर सब का साथ न मिलने पर हारते हुए देखा है | बहुत बार चीजें हमारे नज़रिए में सही होती है पर सामने वाला का नजरिया वो सब नहीं देख पाता | अगर तुम्हें लगता है कि तुम सही हो या फिर तुम ख्वाइश रखती हो सही होने की तो भिड़ जाओ, किसी और के लिए नहीं बल्कि खुद के लिए घर वालों से, जमाने से किसी से भी क्यूंकि जिस दिन तुम खुद को सही साबित कर दोगी उस दिन सारी दुनिया तुम्हारी मुट्ठी में होगी | इस दौरान अगर तुम हार के ठोकर खा भी गयी तब भी ये याद रखो कि तुम मजबूत हो के दो कदम आगे ही बढ़ी हो पीछे नहीं गिरी | हार के सवालों से डरो नहीं उस का भी सामना करो |

दुनिया कहती है नारी सहनशीलता की मूर्ति होती है , उन दुनिया वालों के इस विचार को किनारे डाल दो क्यूंकि तुम्हे अपनी ज़िन्दगी खुद गढ़नी है तुम्हारे परिवार वाले,तुम्हारे दोस्त,तुम्हारे ऑफिस वाले तुम्हें इस में मदद करेंगे पर तुम्हें खुद ही खुद को बनाना होगा | दुनिया को अपने चश्में से देखो ,सीखो नया कुछ रोजाना | खुद को कुछ चीजों तक में ही न समेट दो | अगर बाहर की तुम्हें अच्छी समझ हो तो घर की भी समझ तुम्हें उतनी ही होनी चाहिए | अगर तुम दुनिया के सामने प्रेजेंटेशन दे रही हो तो पाँव में मोच आने पर सरसों के तेल में लहसन गर्म करके मालिस करने पर दर्द कम होता है के ज्ञान की पोटली भी तुम्हारे पास होनी चाहिए |
तुम्हें मुझ से ज्यादा अच्छे से पता है कि जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ महिला और पुरुष की बराबरी की बातें कम ही होती है | एक नजरिया यह है कि इस बात पे हंगामा करो कि मैं ये नहीं करुँगी , समाज हाय हाय, दूसरा तरीका ये हो सकता है कि मैं बदलाव की शुरुवात अपने घर से करूँ और पहले उन लोगों को बदलू जो मेरे अपने है | तुम पापा से कपड़े धुलने को कह सकती हो , मुझ से झाड़ू मारने को या कल के दिन जब तुम्हारी शादी हो जाए तो अपने पति को प्यार से बराबरी की बातें समझा सकती हो ,बराबरी में काम करना सिखा सकती हो ताकि कल अगर तुम्हारें बच्चे हों तो उनका जन्म उस घर में हो जहाँ सब बराबरी पर बिस्वास करतें हो | ये तरीका जरा लम्बा जरुर है पर पीढियां सुधारने वाला है |
रिश्ते हमारी ज़िन्दगी में वही काम करतें हैं जैसे साईकिल के पहिये के लिए बॉल बेयरिंग | हमें उस पर कभी कभी ग्रीस या तेल भी डालना पड़ता है जिससे साईकिल का पहिया अच्छे से चलता रहे | ज़िन्दगी के पहिये को बराबर घुमाने के लिए हमें रिश्तों को इज्ज़त और वक़्त का ग्रीस देना पड़ता है ताकि वो अच्छे से चल सकें | अगर तुम्हें कभी लगे कि ये रिश्ते तुम्हारी ज़िन्दगी में बड़ी रुकावट बन रहे हैं जो कि वक़्त और इज्ज़त की ग्रीस डालने से भी नहीं ठीक हो रहे तो खुद को उन रिश्तों से किनारे करने में ही भलाई है | किसी रिश्ते को इस कड़वाहट पर कभी मत छोड़ देना कि तुम्हें उन रिश्तों से नज़रें चुरानी पड़ें |       
   ज़िन्दगी में बड़े सपने देखो ,उन्हें हासिल करने की कोशिश करो जीतो,हारो,सीखो,घूमों क्यूंकि तुम्हें केवल तुम ही गढ़ सकती हो बाकी कोई और नहीं.
इस रक्षा बंधन मुझ से नहीं खुद से ये वचन लो कि तुम चाहे ज़िन्दगी की कोई भी मुश्किल हो ज़िन्दगी जीनें का फलसफा कभी नहीं खोओगी | क्यूंकि इस दुनिया में तुम्हारे लिए कोई सबसे इम्पोर्टेन्ट है तो वो सिर्फ तुम हो अपना ख़याल रखना |
तुम्हारा भाई
बिमल    

    

Thursday, April 06, 2017

रुको ...क्या किसी को हराना इतना जरुरी है ?

डियर ज़िन्दगी कैसे हो ?
होप तुम अच्छी ही होगी , आज तुम्हे ख़त लिखने को मन तो नहीं था पर कुछ मौका बन गया | अब तुम सोचोगे कि मौका कैसा ? तो मौका ये थी कि अपनी ज़िन्दगी की गुफ्तगू करने के लिए जो चंद नंबर मेरे पास थे उन्हें जब फोन लगाया तो कई नंबर उठे नहीं , कई नंबर कहीं और गुफ्तगू में व्यस्त थे | तो तब मुझे लगा की छोड़ो यार दूसरों को खुद अपनी ज़िन्दगी से ही बातचीत कर ली जाए |

ज़िन्दगी पता तुम्हें मेरे आसपास के लोग सब भाग रहे हैं , तेज बहुत तेज और भी तेज | पर हर शाम या कहें कि कुछ एक शाम बाद जब उन्हें कहीं पहुँचते नहीं देखता तो मन दुखी होता है | हम सब या तो फिर अपने गुजरे पल का रोना रो रहे होते हैं या फिर अपने आने वाले पल के लिए समेट रहे होते हैं बस इस पल में कोई नहीं रहना चाहता | पिछले साल जब मैं राजस्थान के अम्बेर फोर्ट में लाइट एंड साउंड शो देख रहा था तो मैंने जब बीच में एक बार नज़र उठा कर पीछे देखा तो 80% लोग अपने कैमरे से उस नज़ारे को कैद करने में जुटे पड़े थे | कोई उस वक़्त को अपने आँखों में कैद नहीं कर रहा था , यही तो करते हैं हम |

बोर्ड एग्जाम कुछ जगह ख़त्म हो गये कुछ जगह बाकी हैं | उस के बाद रिजल्ट आएगा और उस के बाद होगा अच्छे कॉलेज में एडमिशन वाला हाई प्रोफाइल ड्रामा | इस के अलावा एंट्रेंस टेस्ट जैसे नीट और आई.आई.टी जी के रिजल्ट भी आयेगें | मेरे लिए सब से ज्यादा कठिन महीने होते हैं मई से लेकर अगस्त तक, क्यूंकि इस में हमारे देश में सुसाइड रेट बहुत बढ़ जाता है | मुझे बहुत बुरा लगता है इस फैक्ट को जब भी मैं बार बार सुनता हूँ कि हमारा देश यूथ सुसाइड में नंबर 1 पर है | किसे दोष दें इन आत्महत्याओं का ? बच्चों को , उन के माँ बाप को या सोसाइटी को ? क्यूँ हम कभी ये नहीं समझ पाते कि किसी भी बड़े कॉलेज में पहुँच जाना ज़िन्दगी का आखिरी लक्ष्य नहीं हो सकता | ज्ञान और अच्छे मार्क्स के बीच में कोई संबंध नहीं है अच्छे मार्क्स लाना एक अच्छी प्लानिंग का नतीजा है न कि अच्छी पढाई का | दुनिया बदलने के लिए अगर अच्छे मार्क्स लाना ही जरुरी होता तो कहाँ हैं सालों साल की मेरिट लिस्ट वाले वो बच्चे ? क्यों गायब हो जाते हैं सिर्फ एक बार स्टार बनने के बाद वो ? मैं अच्छे मार्क्स का विरोध नहीं करता पर मुझे लगता है कि सिर्फ अच्छे मार्क्स लाना ज़िन्दगी की सफलता का सक्सेस मंत्र नहीं है |

मेरा भाई डॉ. है क्यूंकि वो ये चाहता है , मैं डॉ. नहीं हूँ क्यूंकि मैं ये नहीं चाहता | मुझे मजा आता है दुनिया घूमने में, नए नए लोगों से मिलने में, नई नई कहानियां लिखने में, दुनिया भर के युवाओं से मिलने में और मैं इस बात पर बहुत खुश हूँ | कुछ एक दिन पहले मेरी चचेरी छोटी बहिन ने मुझ से एक बात कही, उस ने कहा कि भैय्या मैं जब पूरे परिवार के सामने बड़े भैय्या की रिस्पेक्ट होते देखती हूँ तो मुझे आप के लिए बुरा लगता है , आप को बाहर वाले तो इतना रिस्पेक्ट देते हैं पर परिवार वाले नहीं समझ पाते | मैं चाहती हूँ कि आप इतने बड़े आदमी बन जाओ की आप बड़े भैय्या को हरा दो | उस के सवाल पर मैं उस के मन को पढ़ पा रहा था कि कैसे सोसाइटी का इफ़ेक्ट उस के दिमाग में ये असर पैदा कर रहा है कि वो दो भाइयों को उन के प्यार नहीं बल्कि उन के ओहदे की नज़र से देखे | मैंने उस का जवाब दिया कि ये मेरी ज़िन्दगी है और मैं किसी को हराने या किसी को कुछ दिखाने के लिए नहीं कर रहा हूँ | जो मैं कर रहा हूँ उसे मैंने चुना है और ये मेरी सच्चाई है कोई उस पर क्या सोचता है ये मेरी दिक्कत नहीं है | मैं भाई को कैसे हरा सकता हूँ जब कि हमारे रास्ते ही बिल्कुल अलग अलग हैं, और किसी को हराना ही क्यूँ है ? जब कभी लगे कि तुम भीड़ के साथ साथ भाग रहे हो या तुम्हें किसी को हराना है वो रुक जाओ वहीँ पे सोचो इस बात पे कि क्या किसी को हराना इतना जरुरी है ? अपनी ज़िन्दगी जियो और खुश हो के जियो | सुना होगा न जियो और जीने दो |  
ये ज़िन्दगी मेरी अपनी है,सब की ज़िन्दगी में उतार चढाव चलते रहते हैं और ये उतार चढ़ाव बताते हैं कि हम जिंदा है बस हौसला नहीं खोना है हमें | कोई इंसान या सोसाइटी इतनी ताकतवर नहीं हो सकती कि उस के एक सवाल या आरोप से मेरा पिछला अनुभव सारा धरा का धरा रह जाए | बात करो दुनिया भर में बहुत लोग हैं उस से अलग अलग मुद्दों पर बात करो | उन्हें समझो कैसे उन्होंने खुद और अपने ज्ञान को खड़ा किया है |दूसरे के ज्ञान से घबराओ नहीं , अपनी समझ पैदा करो | खुद के लिए लक्ष्य रखो ,खुद को हराओ तब देखो कि ज़िन्दगी में कैसा नयापन आता है |
बात करो अगर परेशान हो तो , क्यूंकि बात करना बहुत जरुरी है , कहानी लिखो ,कविता लिखो ,फेसबुक पर लिखो,ऑडियो रिकॉर्ड करो , ब्लॉग लिखो कुछ भी हो खुद को जाहिर करो हर हालत में | बस कभी अकेले मत परेशान हो |
आज के लिए बहुत बात हो गयी तुझ से मिलतें हैं फिर जल्दी नए किस्सों के साथ
तुम्हारा
जज्बात ए बिमल      


Tuesday, March 07, 2017

अस्तित्व की सामाजिक लड़ाई है "विधवा "

ये बात कहने का ख्याल मेरे दिमाग में पहली बार तब आया था जब 2013 में मैंने एक 21 साल की लड़की को देखा जिस ने तीन महीने पहले ही केदारनाथ आपदा में अपना पति खोया था | जो एक सरकारी कार्यक्रम में मुआवजे का चेक लेने देहरादून आई थी और भीड़ में सबसे पीछे बैठ कर अपने पर्स से निकाल कर बिंदी लगा रही थी | अचानक उसका नाम आगे से पुकारा गया उस का हाथ सबसे पहले उस बिंदी पर गया और उसे हटा के आगे सरकारी चेक लेने आगे गयी | मेरे दिमाग में पहला सवाल यही था कि क्यूँ उस ने वो बिंदी हटाई ? क्यूँ वो उस के साथ आगे स्टेज पर या यूँ कहें समाज के सामने क्यूँ नहीं गयी ? मैं ये सवाल उस से नहीं पूछ पाया क्यूंकि उस कार्यक्रम के बाद मैंने उसे नहीं देखा, सच कहूँ तो मैंने उसे खोजा ही नहीं क्यूंकि ये सवाल पचाने में मुझे काफी वक़्त लगा |

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों पर बातचीत हो रही है | हर क्षेत्र में महिलाओं की बढती भागीदारी बढ़ते समाज का एक अच्छा पक्ष हमारे सामने रख रहा है | ऊपर लिखी घटना की छाप मेरे दिमाग में काफी गहरी थी तो मैंने पड़ताल को इस मुद्दे पर केन्द्रित किया | वर्तमान समाज में एकल महिला एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिस पे बहुत कुछ आजकल लिखा जा रहा है पर मैं एकल महिला विषय पर सिर्फ और सिर्फ विधवा महिलाओं पर आज भी कोई खुल कर बात नहीं करता |

 महिला अधिकारों पर कई वर्षों से कार्यरत दीपा कौशलम ने बताया कि अगर बात करें दुनिया की तो सन 2015 की विश्व विधवा रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में विधवाओ की संख्या 258,481,056 बताई है जो की 2010 के मुकाबले 9% अधिक है। उत्तराखंड के आंकड़ों की बात करें तो 2011 में हुई जनगणना के अनुसार 30 से 79 वर्ष तक विधवाओं की संख्या 337295 है | यह आंकड़ा 2011 का है उस के बाद हम केदारनाथ आपदा झेल चुके हैं और भी कई तरह की घटनाओं के हम गवाह हैं जिस से यह आंकड़ा और बढ़ा है उत्तराखंड राज्य से काफी लोग सेना में हैं और जो कि सीमा पे शहीद भी होते हैं तो यहाँ पर शहीदों की विधवाओं का भी काफी ज्यादा है |

हमारे समाज में विधवाओं को एक अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता | शास्त्रों में कही बातों के अनुसार उनके पापों की वजह से वो विधवा हुई हैं | विधवा होना सबसे पहले उस की सामाजिक पहचान को ख़त्म करता है क्यूंकि पुरुष प्रधान समाज में उस की पहचान का केंद्र पुरुष है अगर वही ख़त्म हो गया तो कैसी पहचान ? विधवा होना उसकी ज़िन्दगी का हर रंग छीन लेता है | शादी या अन्य कार्यों में होने वाले नाच गाने से उस की उपस्थिति ख़त्म हो जाती है |

राज्य महिला आयोग उत्तराखंड की सचिव रमिन्द्री मन्द्रवाल ने बताया की इस तरह की स्थिति किसी भी महिला को अलग अलग स्तर पर तोड़ देती है जैसे कि भावनात्मक, आर्थिक तथा सपोर्ट सिस्टम | भावनात्मक रूप से देखें तो किसी भी महिला के लिए कठिन होता है इस स्थिति को समझ पाना क्यूंकि बच्चों का भविष्य और खुद का भविष्य उसे धुंधला नज़र आने लगता है | आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा प्रभावित होती है क्यूंकि अधिकतर उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में महिलाएं ज्यादा आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं ऐसे में उन्हें अपनी जरूरतों के लिए आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है | तीसरा मुख्य बिंदु सपोर्ट सिस्टम, उन्हें न सास ससुर से मदद मिल पाती है न और न ही माँ बाप ही अच्छे से सपोर्ट कर पाते हैं | विधवा होना एक तरह से उनके अस्तित्व की ही लड़ाई है | दुबारा शादी का सवाल इतना आसान नहीं है क्यूंकि शादी तो हो ही जाएगी पर सवाल बच्चों का है | क्यूंकि ये असमंजस की स्थिति हमेशा बनी रहती है कि पता नहीं कोई दूसरा आदमी बच्चों को अपनाएगा या नहीं अपनाएगा ऐसी स्थिति में वो अकेले ही रहना ज्यादा सही समझती हैं |

केदारनाथ आपदा के बाद उत्तराखंड के तक़रीबन 150 परिवारों की जनसँख्या वाले चमोली जिले के  देवली भणी गाँव में 50 के करीब विधवाएं हैं | जिसमें 20 के करीब बहुत कम उम्र यानि 25 के करीब है | उनके ही बीच की एक लड़की रचना कपरवाण ने कहा कि मुझे दुःख होता है जब मैं देखती हूँ कि शादी पार्टियों में इन्हें शामिल नहीं होने देते,मेकअप नहीं करने देते | उसने हँसते हुए बताया कि मेरी हम उम्र दोस्त जो कि विधवा है उस के बारे में एक सपना देखा कि उसकी दुबारा शादी हो रही है , पर सच में सपना ही है | मैं चाहती हूँ उन्हें इज्ज़त मिले , वो स्वतंत्र हों किसी एन.जी.ओ के सहारे ज़िन्दगी न काट दें , किसी के दबाव में न आयें | वो अपनी अधूरी जी रही ज़िन्दगी को पूरा जियें कमी जो है उसे भरने की कोशश करें |

उत्तराखंड में एकल महिला के विषयों पर एक ग्रुप “स्वयं सिद्धा” कार्य कर रहा है | “स्वयं सिद्धा” की संचालिका शोभा रतूड़ी ने बताया कि अधिकारों पर बात करना बहुत जरुरी है | विधवा पेंसिन को बढ़ाने की बात सरकार के समक्ष रखी थी जो मुख्यमंत्री ने मानी भी थी | जनसुनवाई हमारा एक तरीका है एकल महिलाओं तक पहुँचने का जिसमें शहर और गाँव की महिलाओं की अलग अलग समस्याओं से हम रूबरू होते हैं |  
  
यह सच में महिला सशक्तिकरण का दुनिया भर में डंका पीटने वाले देश के लिए भयावाह स्थिति है | विधवा महिला को डायन कह देना या पति की मौत के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना पूरे भारत में आम है | ऐसी महिला का चरित्र सदा शक के दायरे में डाल दिया जाता है , चाहे वो किसी से भी 2 मिनट बात भी कर ले तो | हमारा समाज काफी दोगला समाज है किसी पुरुष की पत्नी मार जाने पर साल दो साल में हम बच्चों के नाम पर उस की शादी करवाने पर तुल जाते हैं पर उसी स्थिति में जब किसी महिला का पति मरता है तो हम समाज की दुहाईयाँ देने लगते हैं | इस बात से ये बात भी जुडी है कि बच्चों के नाम आदमी की शादी करा कर उसे सेक्स लाइफ को आगे बढ़ाने की छूट है पर हमारे यहाँ महिलाओं को ये छूट या कहें कि सुविधा नहीं है |

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नजदीक जनजातीय क्षेत्र जौनसार में थोडा नजरिया अलग है | अगर कोई लड़की विधवा हो जाती है तो उसे हीनता से नहीं देखा जाता और अगर वो अपने माँ बाप के घर लौटना चाहे तो उसे पूरे अधिकार मिलते हैं | रहने की जगह खेती बाड़ी के साथ साथ उस के बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी उस के नजदीकी रिश्तेदार अच्छे से निभाते हैं | कई अन्य जनजातीय क्षेत्र भी भेदभाव से परे हैं | ऐसे में एक सवाल मेरे मन में आता हैं कि जिन जनजातीय क्षेत्रों को हम पिछड़े हुए और जंगली कहते हैं क्या वो हमारे मुख्य धारा के समाज से सोच में कई सदी आगे नहीं हैं ? जो एक दुर्घटना से किसी की ज़िन्दगी की मुस्कान नहीं छीन लेते |


कोई एक घटना दुर्घटना किसी की ज़िन्दगी की मुस्कान नहीं छीन सकती न रंग छीन सकती है | अपने आसपास हो रही ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं दें | दुनिया बदलने की पहली कड़ी हम हैं और इस तरह के भेदभाव को हमें ही रोकना होगा |                        

Thursday, February 16, 2017

मेरे सवाल और देशद्रोह


मैंने पूछा कि ये सड़क क्यूँ सालों से नहीं बन रही ?
उस ने कहा चुप रहो, वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुम्हें सड़क की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने पूछा लाखों बच्चे स्कूल क्यूँ नहीं जा पा रहे ?
उस ने कहा चुप रहो वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुम्हे बच्चों के स्कूल की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने पूछा लाखों युवा बेरोजगार क्यूँ हैं ?
उस ने कहा देशद्रोही कहीं के चुप हो जाओ, वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुम्हें युवाओं की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने पूछा माजरा क्या है कि अपने ही देश में हम सुरक्षित नहीं हैं ?
उस ने कहा कि खामोश ,वहां सीमा पे जवान मर रहे और तुम्हें खुद की सुरक्षा की पड़ी है |
मैं चुप हो गया ||


मैंने जानना चाहा कि देश में इतना भ्रष्टाचार क्यूँ है ?
उस ने कहा तू राष्ट्रद्रोही है ,वहां सीमा पे जवान मर रहे और तुम्हें भ्रष्टाचार की पड़ी है |
और मैं इस बार भी चुप हो गया |


मैंने कहा इतने बड़े बजट के बाद भी सीमा पे जवानों को सही खाना क्यूँ नहीं मिल रहा ?
उस ने कहा चुप हो जा वहां सीमा पे जवान मर रहे हैं और तुझे उन के खाने की पड़ी है ?
मैंने कहा भाई मेरा सवाल भी तो वही है कि क्यूँ सीमा पे जवान भूखे पेट मर रहा है?
उस ने फिर कोई जवाब नहीं दिया .....
और मुझे देशद्रोही का सर्टिफिकेट जारी कर दिया
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