मेरे पिता और उनकी किच किच


मेरे पिता किच किच करते थे  ,
मेरे पिता किच किच करते थे ,जब मैं पढता नहीं था  |
जब मैं खाना सही से नहीं खाता था |
जब मैं क्लास में पीछे बैठता था |
जब वो मेरा झूट पकड़ते थे |
जब मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था |
जब मैं एक्स्ट्रा पॉकेट मनी मांगता था |
जब मैं डॉ. नहीं बनना चाहता था |
जब मैं उन्हें अपने सपने सुनाता था
एक दिन मैंने अपने पापा से किच किच की उनकी किच किच पर
उन्हें समझाया कि मेरी किच किच के मायने क्या हैं ?
उन्हें दिखाया कि उनकी किच किच मेरी किच किच से कैसे अलग है ?
उन्हें बताया कि जायज़ है उनकी किच किच भी ,
पर हर बार दोनों की किच किच एक हो जरुरी तो नहीं |
वक़्त लगा उन्हें किच किचो के इस दौर में मेरी किच किच को समझने में |
और आज 
मेरे पिता अब भी किच किच करते हैं
जब मैं अपने सपनों से भटकने लगता हूँ |
जब मैं रुक जाता हूँ ठोकर खा कर |
जब मैं सफलता के मद में चूर हो जाता हूँ |
जब मैं खुद से किये वादों तो तोड़ने लगता हूँ
जब मैं दायरों में बांधने लगता हूँ खुद को |
जब मैं थकने लगता हूँ  |
एक दिन मैंने अपने पापा से किच किच की उनकी किच किच पर   
पर इस बार मेरे पापा ने मुझे समझाया कि इस किच किच के मायने क्या हैं ?
उन्होंने दिखाया कि इस किच किच पर उनका नजरिया क्या है ?
इस बार मुझे बताया कि ये किच किच कैसे मुझे ज़िन्दगी की बड़ी लडाइयों के लिए तैयार करेगी ?
और इस बार थोडा मैंने ज्यादा किच किच किया और वक़्त लगाया उनकी किच किच को समझने में
और आज मैं समझता हूँ कि क्यूँ जरुरी है ये किच किच
और मैं चाहता हूँ मेरे पिता ताउम्र यूँ ही किच किच करते रहें 
क्यूंकि उनकी किच किच जरुरी है ताकि मेरी ज़िन्दगी में किच किच न हो |  



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ईद और नया परिवार

मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं कि कोई बार बार पैकेजिंग यूनिट को रोक के आधे आधे घंटे का आराम फरमाए | मैं पिछले एक 15 दिन से तुम लोगों का ये ड्रामा देख रही हूँ , नयी हूँ इस कंपनी में इस का मतलब ये बिलकुल नहीं है कि कुछ नहीं कहूँगी .... नमिता पैकेजिंग यूनिट के सुपरवाइजर पे एक तरफ़ा चिल्लाते हुए बोली और बिना कुछ सुने दरवाज़े को पीटते हुए अपने केबिन में चली गयी |
उस के इस गुस्से को देख कर सुपरवाइजर ने सब को काम पर वापस लगा दिया और दवाइयों के पैकेट कॉटन बॉक्स में भर के स्टोर रूम को जाने लगे |
आरव अपने केबिन में बैठे ये सब देख रहा था , उस ने इण्टरकॉम से कॉल करके नमिता को केबिन में बुलाया |
May I come in sir  ? नमिता ने पूछा
Yes , please come in . आरव ने कहा
तो नमिता कैसा चल रहा है सब ? कैसा लग रहा है यहाँ ? आरव ने बैठने का इशारा करते हुए कहा |
अच्छा चल रहा है सर , सीख रही हूँ बहुत कुछ ... नमिता ने जवाब देते हुए कहा
कोई बात लगी यहाँ ? आरव ने फिर सवाल किया
नहीं सर कोई ख़ास नहीं काफी अच्छी टीम है | नमिता ने कम शब्दों में ही जवाब दिया
क्या सच में तुम्हें कुछ अलग नहीं लगता ? आरव ने सवालों के कटघरे में नमिता को घेरते हुए कहा
सर लगता तो है पर मुझे नहीं पता कि इसे कहना कैसे है ? नमिता ने डरते डरते कहा 

अरे खुल के बताओ ... आरव ने उस के डर पहचानते हुए कहा

सर मुझे दिक्कत होती है अपनी टीम के साथ वो काम कम और आराम ज्यादा करती है ? नमिता ने एक साँस में कहा
पर पिछले तीन सालों से पैकेजिंग डिपार्टमेंट ही बेस्ट टीम का अवार्ड ले जा रहा है और उनकी वजह से कंपनी का मुनाफा भी बढ़ा है | आरव ने आराम से कहा
पर सर ... नमिता ने थोडा परेशान हो कर कहा 

एक काम करो नमिता तुम तो नाईपर मोहाली की पास आउट हो न पता लगाओ कि क्या है ऐसा पैकेजिंग डिपार्टमेंट में जो वो पिछले इतने सालों से बेस्ट है ? आरव ने टास्क देते हुए कहा

ठीक है सर मैं एक हफ्ते बाद आप को जवाब दूंगी | नमिता ने सीट से उठते हुए कहा
नमिता इस सवाल से बहुत परेशान हो गयी , वो बार बार कोशिश करती पुरानी फाइलों को उलटते पुलटते हुए इस सवाल का जवाब खोजते हुए | 

इस पूरे हफ्ते नमिता अच्छे से सो नहीं पाई और 3 शिकायतें भी डाल चुकी थी अपनी टीम के खिलाफ बीच में काम रोकने की बात पर , पर फॉलोअप इस लिए नहीं लिया क्यूंकि बॉस यानि आरव का दिया हुआ टास्क पूरा नहीं हुआ था |

हफ्ता बीत जाने के बाद भी नमिता नहीं जान पाई थी कि पैकेजिंग डिपार्टमेंट बेस्ट क्यूँ है ? बार बार काम रोकने की बात पर जब नमिता ने चौथी शिकायत डाली तो आरव ने उसे अपने केबिन में बुला लिया
सो नमिता मिला जवाब ? आरव ने मुस्कुराते हुए पूछा
सॉरी सर नहीं मिला पर मैं सारे डाटा को स्टडी कर रही हूँ जल्द ही मैं आप को अपनी रिपोर्ट दूंगी | नमिता ने सब कुछ एक साँस में कह दिया
पर सर एक सीरियस कंसर्न है पैकेजिंग यूनिट हर 2 घंटे में आधे घंटे के लिए बंद कर दी जाती है जिससे वक़्त का नुकसान होता है पूरी टीम काफी बाद तक भी रूकती है ,नमिता ने अपनी समस्या बताते हुए कहा |
पर जहाँ तक मुझे पता है पैकेजिंग यूनिट का एक भी टास्क पेंडिंग नहीं है और वो लोग ओवरटाइम भी नहीं ले रहे ? आरव ने सवाल करते हुए कहा
क्या तुमने कभी किसी से पूछा ? कि वो ऐसा क्यूँ करते हैं ? आरव ने सवाल पे सवाल दागा
सर सुपरवाइजर से क्या पूछना ? उसे तो आर्डर देना होता है और वो मेरा कहा मानता भी है  | नमिता ने बड़े कॉलेज के बड़े एटिट्युड को सामने रखते हुए कहा |
नमिता कभी तुम पैकेजिंग टीम के रहीम चाचा से मिली हो ? आरब ने पूछा
आरव के मुहँ से किसी के नाम के आगे चाचा सुन कर उसे अजीब लगा क्यूंकि कॉलेज की बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में तो उसे किसी भी स्टाफ को सर मैम के अलावा तो कुछ भी नहीं सिखाया था |
नहीं सर नहीं मिली नमिता ने घबरा कर कहा |
नमिता हमारी कंपनी का सक्सेस का फंडा तुम्हें पता है किस ने ईजाद किया है ? रहीम चाचा ने .. अराव ने एक ही लाइन में सवाल और जवाब दोनों को रखते हुए कहा |
वो कैसे सर ? नमिता को कॉलेज की पढाई नया समझने को मिल रहा था कुछ |
9 साल पहले मैंने जब कंपनी शुरू किया था तो मेरे पास कुछ एक बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनीयों का अनुभव था एक विदेशी यूनिवर्सिटी से एम्.बी.ए की डिग्री थी पर फिर भी मैं  मुनाफा नहीं कमा पा रहा था  | एक दिन मैं अपने ऑफिस में यूँ ही परेशान बैठा था तो रहीम चाचा ने मुझे पानी का ग्लास देते हुए कहा कि सर छोटे मुहँ बड़ी बात पर मैं आप को समस्या को सुलझा सकता हूँ | उन्होंने मुझे कंपनी को एक परिवार की तरह चलाने को कहा हर एक टीम की दिक्कतों को खुद सुनने को कहा | ये बातें मुझे किसी एम्.बी.ए प्रोग्राम ने नहीं सिखाई थी  और एक ख़ास बात उन्होंने मुझ से कही
क्या सर ? नमिता ने पूछा
उन्होंने मुझे कहा सर हमारी कंपनी में पैकेजिंग टीम में कई मुस्लिम परिवारों से हैं रमजान के पाक महीने में वो रोज़े रखते हैं , पैकेजिंग में स्पीड से काम होता है जिससे वो थक जाते हैं अगर हम हर २ घंटे में आधे घंटे का ब्रेक दें और थोडा सा ऑफिस टाइम बढ़ा देंगे तो काम भी नहीं रुकेगा और टीम भी नहीं थकेगी | क्यूंकि साल में २ महीने छुट्टी तो नहीं कर सकते न ?
मैं उस वक़्त सारी कैलकुलेशन लगा कर इस बकवास आईडिया को सुन कर कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो ?
सर ऐसा जरुर होगा और अगर नहीं हुआ तो आपकी हर सजा मुझे मंज़ूर होगी | रहीम चाचा ने जवाब में कहा
नमिता एक वो वक़्त था और एक आज कंपनी कभी घाटे में नहीं गयी , कंपनी चलाने के तो सारे प्रोग्राम है पर परिवार चलाना कोई नहीं सिखाता उस के लिए रहीम चाचा जैसे लोग ही ज़िन्दगी के किसी मोड़ में मिलते हैं |
तभी केबिन के दरवाज़े पर दस्तक हुई , दरवाज़े पर रहीम चाचा थे | नमिता अपनी सीट से उठी
अरे मैडम बैठिये बैठिये वो कल ईद है न तो कई लोग कल सुबह के वक़्त नहीं आ पाएंगे तो आधे दिन की छुट्टी मिल जाती तो ? टीम ने नमिता के गुस्से को देखकर रहीम को आगे करते हुए भेजा था |
नमिता केबिन से बाहर आई और पैकेजिंग यूनिट की तरफ बढ़ी  , आरव और रहीम भी पीछे पीछे हो लिए | नमिता को देख सभी खड़े हो गये
ईद मुबारक सभी को और कल की छुट्टी है और हाँ परसों मेरे लिए सिवाई लाना मत भूलना
सभी में ख़ुशी की लहर दौड पड़ी |
ये ईद नमिता के लिए सीख का नया तौहफा लायी थी जिसमें उस का परिवार अब बढ़ गया था और उस में कई लोग उस की कंपनी के शामिल हो चुके थे और वो पैकेजिंग यूनिट की हेड से इस परिवार का हिस्सा बन चुकी थी | 
  

   





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नजरिया चाय और लोगों को परखने का


वो- सॉरी मैं थोडा लेट हो गयी .. तुम्हे ज्यादा देर तो नहीं हुई ...
मैं – अरे कोई नहीं ..मुझे पसंद है इंतज़ार करना ..या यूँ कहो कि इस इंतजार के वक़्त में मुझे कुछ खाली वक़्त मिल जाता है खुद से रूबरू होने का ...
वो – ओ हो... बड़ा ही डीप थॉट था... थोडा ऊपर से गुज़र गया ..पर कोई नी दुनिया भर की सारी बातें हमें ही समझ आयें जरुरी तो नहीं...
मैं – मैंने चौका मारा तो तुमने तो सीधे छक्का जड़ दिया ..खतरनाक प्रैक्टिकल थॉट दिया तुमने ... मैं इतना प्रैक्टिकली नहीं सोच पाता .. 
वो – पहले मैं भी नहीं सोचती थी फिर ऐसे ही... खैर क्या लोगे तुम ? 
मैं – यहाँ की चाय बड़ी बकवास है ...कुछ और ट्राय करते हैं... पिछले एक घंटे में 4 चाय पी चूका हूँ ...
वो – ओह सॉरी तुम पिछले एक घंटे से यहाँ हो... और अगर चाय इतनी ही बकवास थी तो 4 क्यूँ पी ?
मैं – 4 इसलिए पी क्यूंकि मैं पहली बार में ही कोई जजमेंट नहीं बना लेना चाहता था..मैं वक़्त देना चाहता था किसी भी बात को प्रूव होने में ...
वो – सिर्फ चाय के साथ ऐसा किया या सब जगह ये ही करते हो ? 
मैं – हा हा हा .. डिपेंड करता है ...
वो- चीज़ सैंडविच आर्डर करते हैं ..स्पेशल है यहाँ का ..
मैं – तुम अक्सर आती हो यहाँ ?
वो – हाँ अक्सर ... 
मैं - क्या मैं पहला हूँ जिसे तुम देखने आई हो ?
वो – तुम्हें क्या लगता है ?
मैं – अरे मेरे लगने से क्या होता है ? बताओ न 
वो – हा हा हा ... तुम्हारे सवाल का जवाब ये है या नहीं पर तुम तुम्हारे तरह के पहले हो ...
मैं – और मैं किस तरह का हूँ ?
वो – तुम्हें पढ़ा है मैंने और लिखावट में तो तुम बाकियों जैसे नहीं हो ..पता नहीं असल ज़िन्दगी में तुम कैसे हो ... मैंने अक्सर अपने आसपास बहरूपियों को पाया है 
मैं – एक सवाल करूँ ? थोडा पर्सनल है ..बुरा तो नहीं मानोगी ...
वो – पूछ लो.. सवालों से क्या डरना ...बी.जे.पी से थोडा न हूँ... हाँ अगर जवाब देने लायक नहीं हुआ तो नहीं दूंगी...
मैं – तुम्हारी रिंग फिंगर पे निशान है ...
वो – अरे वाह ऑब्जरवेशन बड़ा तगड़ा है तुम्हारा ... 
मैं – हर बदले हुए रंग की एक कहानी होती है और तुम्हारे हाथ में सिर्फ उस ऊँगली पर निशान था तो लगा पूछ लूँ..
वो – हाँ रिश्ता हुआ था मेरा ..उस की कहानियों पे मरती थी ..वो लड़का भी एक कहानी निकला ...कल्पना के कैनवास से ज्यादा कुछ नहीं ...बांसुरी सा खोखला.. तो सोचा क्यूँ नकली रिश्तों को ढोना.. रिंग उतार के फेंक दी नदी में 
मैं – रोई भी तुम ?
वो – तुम सवाल बहुत करते हो... बुद्ध से इंस्पायर हो क्या ?
मैं – मेरे सवाल का ये जवाब नहीं है 
 वो -हाँ थोड़ी देर बस ..किसी के लिए आंसू और वक़्त क्यूँ बर्बाद करना ..
मैं – फिर मुझ से मिलने क्यूँ आ गयी ? मैं भी तो लिखता हूँ 
वो – मैं एक बारी में ही कोई जजमेंट नहीं बना लेती ..वक़्त देती हूँ ...क्यूंकि हर कहानी एक जैसी नहीं होती ...
उस दिन उस मुलाकात में बहुत सी बातें हुई पर एक बात जो कॉमन थी वो था नज़रिया मेरा चाय को परखने का और उसका लोगों को...  



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हमारा प्यार और तवा फुल्का रोटी


आई लाइक योर स्किन कलर ... मैंने उस के कंधे पर एक किस करते हुए कहा

 ओहो... कितने रेसिस्ट हो तुम ... उस ने हल्की सी मेरे गाल में चपत लगा कर बोला ..


अरे इस में रेसिस्ज्म कहाँ से आ गया ? आई लव यू.. मोर देन ऐनी वन इन दिस वर्ल्ड .. बट फिर भी आई लाइक योर स्किन कलर... मैंने अपने गाल को सहलाते हुए जवाब दिया ...

हे भगवान क्या हो गया रवि तुम्हें ? तुम कबसे इंसान को रंगों में बाँटने लगे ? अब हमारे हाथ में थोडा न है कि कौन सा रंग ले कर हम पैदा होंगे ? उस ने सवाल पर सवाल दागे

हम्म ... मैंने उस के सारे सवालों को इग्नोर कर के उस के वार को खाली कर दिया...

तुम्हें वैलेंटाइन डे पे कौन सा गुलाब चाहिए ?

लाल गुलाब ....

हे भगवान् कितनी रेसिस्ट हो तुम .... लाल गुलाब ही क्यूँ ? काला, सफ़ेद या पीला गुलाब क्यूँ नहीं ? मैंने टांग खींचते हुए कहा ...
अरे यार मैंने उन्हें कहाँ इग्नोर किया बस उस दिन मुझे तुम लाल गुलाब दोगे तो मुझे ज्यादा अच्छा लगेगा ... उसने हल्का नाराज़ हो कर कहा ...

बस तुम सही पकड़ी ... तुम्हारा रंग एक तवा फुल्का रोटी जैसा है और न केवल रंग तुम हो भी वैसे ही ....

वाह वाह... लोगों के पति उन्हें चाँद तारों और न जाने किस किस चीज से कम्पेयर करते हैं और तुम मुझे तवा रोटी बोल रहे हो ??
तवा रोटी नहीं तवा फुल्का रोटी.... मैंने उसे करेक्ट करते हुए कहा ...
हे भगवान् क्या कहूँ मैं....

अरे यार नाराज़ क्यूँ होती है कभी रोटी को देखा है ? वो आटे पानी को सही अंदाज़ और वक़्त तक गुथने और फिर उसे सही आकार में गोल करने और सही टाइम तक पकाने के बाद ही बनती है...

अच्छा जी ? तो बताओ कैसे हुई मैं तुम्हारी तवा फुल्का रोटी ? उस ने चाय का एक कप मुझे दे कर  और अपनी कॉफी के कप पर सवा 2 चम्मच चीनी डालते हुए पूछा .... ( रिया को चाय पसंद नहीं थी और अपनी कॉफी में फिक्स सवा 2 चम्मच चीनी से ही उसकी परफेक्ट कॉफी बनती थी )

यार तुम्हें भी पता है कि हम दोनों की शादी से काफी लोग खुश नहीं थे जिसमें हम दोनों के ही घर वाले थे , बहुत कुछ कहा भी तुम्हें उन्हें पर तुमने सब कुछ भुला कर सबको इतने कम वक़्त पर एक माला में पिरो दिया वही सबसे बड़ी बात है और तुमने सभी चीजें सही मात्रा में सही वक़्त पे की... थैंक्स यार.... मैंने चाय के दो तीन सिप लेते हुए अपनी  पूरी बात कह दी ...

रिया ने बड़ी शांति से बात को सुना और खामोश हो गयी... उस की ये ख़ामोशी मेरे अन्दर हलचल पैदा कर गयी ... मैंने उसे पूछा क्या हुआ ? सॉरी मेरी किसी बात का तुम्हें बुरा लग गया हो तो...
उस ने कॉफी ख़त्म कर के मेरे पास आ कर मेरे माथे को चूम कर कहा...


तुम्हें पता है रवि कोई भी अच्छा वाला ताला सिर्फ अपनी ही चाबी से खुलता है और ताले और चाबी के बीच की सही सामंजस्य ही ताले को हर किसी चाबी से खुलने से बचाता है हम दोनों के बीच भी यही बातें है सिर्फ मैंने ही सब कुछ नहीं सम्हाला तुमने भी मेरे घर वालों के लिए बहुत कुछ किया और हर बार सही वक़्त पे किया , तो सिर्फ मैंने ही तुम्हारी रोटी को पूरा नहीं किया बल्कि उस रोटी को बनने में तुमने भी पूरा साथ दिया ... हा हा हा और तुम्हारी भाषा में तुम भी मेरे तवा फुल्का रोटी हो ...              
और दोनों ही हम एक दूसरे को तवा फुल्का रोटी कह के रेसिस्ट हो गये...


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बिना नाम के रिश्ते की आज़ादी


चाय की चुस्कियों के साथ मैंने उस से सवालिया हिसाब से कहा सुनो...
हाँ बोलो ... उस ने भी अपने लबों से चाय के कप को हटा कर कहा
मैंने महसूस किया है कि तुम ये जाहिर नहीं होने देती कि हम दोनों आपस में जानते हैं एक दूजे को ...मैंने चाय की दूसरी चुस्की लेते हुए पूछा ...
हाँ तो ... क्या जरुरी है सब को बताना ? उस ने सवाल किया
क्यूँ जरुरी नहीं है सब को बताना ? मैंने सवाल का जवाब सवाल में दिया
बताओ तो क्यूँ जरुरी है सब को बताना ? और हो क्या जायेगा ये बताने से ? उस ने शांत तरीके से चाय की चुस्कियों के साथ सवाल दागा ...
अरे यार क्या बात कर रही हो ? बताओ तो क्या हो जायेगा सब कुछ छिपाने से ? मैंने सवाल पे फिर सवाल किया
अच्छा तो सुनो .... तुम्हारा दायरा बहुत बड़ा है ...तुम मानो न मानो पर तुम्हें जानने वाले काफी है ....और मैं तुम्हारे साथ जुड़ कर ....चाहे रिश्ता हमारा जो कुछ भी हो...या न भी हो... इसे लोगों के मुहँ में पान की तरह नहीं परोसना चाहती ... मैं नहीं चाहती कि लोग इसे किस्से कहानियों में बदल दें... क्यूंकि मुझे पता है कि तुम तो कल नई कहानी का किरदार बन जाओगे पर मुझे जूझना पड़ेगा इन्हीं बासी हो चुकी कहानियों संग...
तुम्हें भरोसा नहीं है मुझ पर ? क्या मैं हमारी दोस्ती को यूँ छोड़ के चला जाऊंगा ?? मैंने पूछा
भरोसा मुझे खुद से ज्यादा तुम पर है पर डर मुझे उन लोगों का ज्यादा है जो घूमते हैं हमारे आसपास ...क्यूंकि मैं सच में क्लास की कोने वाली सीट पर बैठने वाली बच्ची रही हूँ जिसे अधिकतर लोग ध्यान नहीं देते और मैं खुश हूँ उस में ही...मैं आगे की सीट पर आ कर भीड़ का सामना नहीं करना चाहती.... मैं सवाल जवाब के दायरों से दूर अपनी ज़िन्दगी बसाना चाहती हूँ....और ये तुम्हारे साथ बिल्कुल भी पॉसिबल नहीं है ...मैं तुम्हारी कहानियों संग कैद नहीं होना चाहती ..
क्या मैं सब कुछ छोड़ दूँ ? मैंने उस को प्यार से गले लगा कर पूछा ...
नहीं...बिल्कुल नहीं... तुम मेरी वजह से बदल जाओ..इस का बोझ नहीं सह पाऊँगी... जो है जैसा है...जहाँ तक है..बस चलने दो इसे... न कोई नाम दो... न कुछ चाहो इस से..ना कुछ खोवो इस के लिए...बस इसे यूँ ही रखने दो..यूँ ही... .. उस ने मुझ पर अपनी जकडन को और मजबूत करते हुए कहा....
ये सवाल जवाब का दौर ख़त्म हो चुका था... न जाने कौन आज़ाद हुआ और कौन कैद हो गया ..
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भीड़ का हिस्सा बनके तुम अपनी मौत के लिए खुद जिम्मेदार होंगे !!!

पहले वो मेरे शहर में आये, लोगों को मारने लगे, 
मैंने कुछ नहीं किया ...

फिर वो मेरे मोहल्ले में आये,
मैंने कान बंद कर लिए...

फिर वो मेरी गली में आये,
मैंने आखे बंद कर ली...

जब वो मेरे घर में आये,
तो मुझे बचाने वाला कोई नहीं था !



द्वितीय विश्वयुद्ध की इस कविता से मैं तब रूबरू हुआ था जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन चल रहा था | इस कविता में कही बातें समाज का वो आईना है जिस पर पर्दा डाल कर हम उससे किनारा तो कर सकते हैं पर वो पर्दा कभी न कभी आईने से हटेगा और जब तक हम उस सच को समझें तब तक शायद बहुत देर हो जाए |

    गौरी लंकेश की हत्या एक अलार्म है | ये अलार्म पहले भी बजते आये हैं कभी राम रहीम केस को सामने लाने वाले रामचंद्र छत्रपति,कभी मलेशप्पा कलबुर्गी और कभी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या से पर हम ध्यान नहीं देते क्यूंकि ये मुद्दे नहीं हैं |     
    
 इस बार अलार्म ज्यादा खतरनाक है | इस बात से नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ख़त्म हो रही है बल्कि इस बात की कि हमारा समाज बड़ी तेजी से वैचारिक शून्य भीड़ में बदलता जा रहा है | हम क्यूँ अपने मुद्दों के लिए नहीं सवाल करते ? कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर गोवाहटी तक हम लाखों मुद्दों से जूझ रहे हैं पर एक तंत्रगत ब्यवस्था के तहत हमें सोचने के लिए मजबूर किया जा रहा है कि हमारा धर्म खतरे में हैं और ये सब मुद्दे गौण हैं अभी हमें धर्म बचाना है |
    
किसान खेती छोड़ रह है , हमारी शिक्षा ब्यवस्था दुनिया में कोई स्थान नहीं रखती , देश के अन्दर गरीब आदिवासियों को गोलियों से भूना जा रहा है , बात बात पर गलियों में भीड़ उग्र हो कर किसी न किसी को मौत के घाट उतार रहे है , पर हम इन सब बातों को बहस के केंद्र में नहीं लाना चाहते |

       कौन है वो लोग जो इतनी उग्रता समाज में फैला रहे हैं ? कौन है वो लोग जो हर मौत को जस्टिफाई कर रहे हैं ? कौन हैं वो लोग जो समाज की सच्चाई सामने लाने पर गोलियों से भून रहे हैं ? कौन हैं वो लोग वो भारत माता की जय के नारे लगा कर औरतों को रंडी ,वैश्या,छिनाल लिख रहे हैं ?

        फेसबुक ,ट्विटर पर इतना लम्बा लम्बा कंटेंट कहाँ से आ रहा है ? कोई तो लिख रहा होगा और संस्थागत तरीके से लिख रहा होगा | घटना के बाद घंटे भर में कैसे फेसबुक और ट्विटर का नीलापन जज्बातों के उमाड़ से बहने लगता है ? अगर वो कंटेंट मैं और आप अपने नाम से नहीं लिख रहे तो वो गुमनाम कौन लेखक है जो इतना जहर अपने हलक से उगल रहा है और हम धडाधड उसे शेयर कर रहे हैं |
      
दोषी कौन है ? केंद्र सरकार या राज्य सरकार या हम खुद ? क्या हम जो सोशल मिडिया पर फैला रहे हैं क्या हम वही बातें अपने परिवार के साथ साझा कर सकते हैं ? अगर किसी लड़की को हम रंडी या वैश्या कह रहे हैं तो क्या हम यही शब्द अपनी माँ,बहन या बेटी के लिए सुन सकते हैं ? अगर नहीं तो हम दोगला ब्यवहार कर रहे हैं समाज में |
       
सरकारों को चुनने में समझदारी दिखाओ | क्यूंकि आज जो खुद को स्थापित करने के लिए साम दाम दंड भेद का सहारा ले सकते हैं उन्हें कल जरूरत पड़ने पर तुम्हें भीड़ से कुचलवाने में वक़्त नहीं लगेगा | 

      विचारों को मत मरने दो , उन्हें स्थापित करो ,सवाल करो, सवालों को ख़त्म मत करो , सवाल पूछने वालों को ख़त्म मत करो | भीड़ का हिस्सा मत बनो क्यूंकि आज तुम भीड़ से अलग होकर अपनी बात नहीं कही तो कल तुम्हारी कहानी सुनने वाला कोई नहीं होगा |  आज गौरी लंकेश थी कल तुम होंगे और तुम ये भी नहीं कह पाओगे कि मैंने कभी कुछ नहीं कहा क्यूंकि वो इसी लिए हो रहा होगा क्यूंकि तुमने कभी कुछ नहीं कहा |     

        



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राखी वाली चिट्ठी और बराबरी की तैयारी

प्यारी बहिन
हाँ तुझे बार बार सताने वाला और सिर्फ पीछे से तेरा ध्यान रखने वाला भाई तुझे आज सीधे ख़त लिख रहा है | मुझे कई बार लगता था कि ये बातें मैं तुझ से कहूँ ज़िन्दगी के अलग अलग वक़्त पर पर मैं कभी कह नहीं पाया इस लिए आज तुझे बहुत कुछ कह रहा हूँ |
मैंने तुझे बहुत बार छोटी छोटी बातों पर सब का साथ न मिलने पर हारते हुए देखा है | बहुत बार चीजें हमारे नज़रिए में सही होती है पर सामने वाला का नजरिया वो सब नहीं देख पाता | अगर तुम्हें लगता है कि तुम सही हो या फिर तुम ख्वाइश रखती हो सही होने की तो भिड़ जाओ, किसी और के लिए नहीं बल्कि खुद के लिए घर वालों से, जमाने से किसी से भी क्यूंकि जिस दिन तुम खुद को सही साबित कर दोगी उस दिन सारी दुनिया तुम्हारी मुट्ठी में होगी | इस दौरान अगर तुम हार के ठोकर खा भी गयी तब भी ये याद रखो कि तुम मजबूत हो के दो कदम आगे ही बढ़ी हो पीछे नहीं गिरी | हार के सवालों से डरो नहीं उस का भी सामना करो |

दुनिया कहती है नारी सहनशीलता की मूर्ति होती है , उन दुनिया वालों के इस विचार को किनारे डाल दो क्यूंकि तुम्हे अपनी ज़िन्दगी खुद गढ़नी है तुम्हारे परिवार वाले,तुम्हारे दोस्त,तुम्हारे ऑफिस वाले तुम्हें इस में मदद करेंगे पर तुम्हें खुद ही खुद को बनाना होगा | दुनिया को अपने चश्में से देखो ,सीखो नया कुछ रोजाना | खुद को कुछ चीजों तक में ही न समेट दो | अगर बाहर की तुम्हें अच्छी समझ हो तो घर की भी समझ तुम्हें उतनी ही होनी चाहिए | अगर तुम दुनिया के सामने प्रेजेंटेशन दे रही हो तो पाँव में मोच आने पर सरसों के तेल में लहसन गर्म करके मालिस करने पर दर्द कम होता है के ज्ञान की पोटली भी तुम्हारे पास होनी चाहिए |
तुम्हें मुझ से ज्यादा अच्छे से पता है कि जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ महिला और पुरुष की बराबरी की बातें कम ही होती है | एक नजरिया यह है कि इस बात पे हंगामा करो कि मैं ये नहीं करुँगी , समाज हाय हाय, दूसरा तरीका ये हो सकता है कि मैं बदलाव की शुरुवात अपने घर से करूँ और पहले उन लोगों को बदलू जो मेरे अपने है | तुम पापा से कपड़े धुलने को कह सकती हो , मुझ से झाड़ू मारने को या कल के दिन जब तुम्हारी शादी हो जाए तो अपने पति को प्यार से बराबरी की बातें समझा सकती हो ,बराबरी में काम करना सिखा सकती हो ताकि कल अगर तुम्हारें बच्चे हों तो उनका जन्म उस घर में हो जहाँ सब बराबरी पर बिस्वास करतें हो | ये तरीका जरा लम्बा जरुर है पर पीढियां सुधारने वाला है |
रिश्ते हमारी ज़िन्दगी में वही काम करतें हैं जैसे साईकिल के पहिये के लिए बॉल बेयरिंग | हमें उस पर कभी कभी ग्रीस या तेल भी डालना पड़ता है जिससे साईकिल का पहिया अच्छे से चलता रहे | ज़िन्दगी के पहिये को बराबर घुमाने के लिए हमें रिश्तों को इज्ज़त और वक़्त का ग्रीस देना पड़ता है ताकि वो अच्छे से चल सकें | अगर तुम्हें कभी लगे कि ये रिश्ते तुम्हारी ज़िन्दगी में बड़ी रुकावट बन रहे हैं जो कि वक़्त और इज्ज़त की ग्रीस डालने से भी नहीं ठीक हो रहे तो खुद को उन रिश्तों से किनारे करने में ही भलाई है | किसी रिश्ते को इस कड़वाहट पर कभी मत छोड़ देना कि तुम्हें उन रिश्तों से नज़रें चुरानी पड़ें |       
   ज़िन्दगी में बड़े सपने देखो ,उन्हें हासिल करने की कोशिश करो जीतो,हारो,सीखो,घूमों क्यूंकि तुम्हें केवल तुम ही गढ़ सकती हो बाकी कोई और नहीं.
इस रक्षा बंधन मुझ से नहीं खुद से ये वचन लो कि तुम चाहे ज़िन्दगी की कोई भी मुश्किल हो ज़िन्दगी जीनें का फलसफा कभी नहीं खोओगी | क्यूंकि इस दुनिया में तुम्हारे लिए कोई सबसे इम्पोर्टेन्ट है तो वो सिर्फ तुम हो अपना ख़याल रखना |
तुम्हारा भाई
बिमल    

    
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