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भीड़ का हिस्सा बनके तुम अपनी मौत के लिए खुद जिम्मेदार होंगे !!!

पहले वो मेरे शहर में आये, लोगों को मारने लगे,  मैंने कुछ नहीं किया ...
फिर वो मेरे मोहल्ले में आये, मैंने कान बंद कर लिए...
फिर वो मेरी गली में आये, मैंने आखे बंद कर ली...
जब वो मेरे घर में आये, तो मुझे बचाने वाला कोई नहीं था !



द्वितीय विश्वयुद्ध की इस कविता से मैं तब रूबरू हुआ था जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन चल रहा था | इस कविता में कही बातें समाज का वो आईना है जिस पर पर्दा डाल कर हम उससे किनारा तो कर सकते हैं पर वो पर्दा कभी न कभी आईने से हटेगा और जब तक हम उस सच को समझें तब तक शायद बहुत देर हो जाए |
    गौरी लंकेश की हत्या एक अलार्म है | ये अलार्म पहले भी बजते आये हैं कभी राम रहीम केस को सामने लाने वाले रामचंद्र छत्रपति,कभी मलेशप्पा कलबुर्गीऔर कभी नरेंद्र दाभोलकरकी हत्या से पर हम ध्यान नहीं देते क्यूंकि ये मुद्दे नहीं हैं |     इस बार अलार्म ज्यादा खतरनाक है | इस बात से नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ख़त्म हो रही है बल्कि इस बात की कि हमारा समाज बड़ी तेजी से वैचारिक शून्य भीड़ में बदलता जा रहा है | हम क्यूँ अपने मुद्दों के लिए नहीं सवाल करते ? कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और …

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राखी वाली चिट्ठी और बराबरी की तैयारी

रुको ...क्या किसी को हराना इतना जरुरी है ?

अस्तित्व की सामाजिक लड़ाई है "विधवा "

मेरे सवाल और देशद्रोह

प्यार की पाती || लव मैरेज अरेंज मैरिज और कुछ उखाड़ना

ज़िन्दगी के नाम ख़त || पाना खोना और खोना पाना दोनों के मतलब

क्या हम वाकई सुरक्षित हैं न्याय के दरवाज़े तक पहुँचने के लिए ? :: प्रधान न्यायाधीश के नाम ख़त

फिर भी क्या सुनेंगे लोग मुझे ?

आमिर खान के नाम ख़त || सत्यमेव जयते पे पलीता

एक मुसाफिर और सराय