ज़िन्दगी के नाम ख़त || पाना खोना और खोना पाना दोनों के मतलब

डियर ज़िन्दगी..
पता नहीं कभी तुम्हे किसी ने ख़त लिखा या नहीं , पर आज मेरा मन हुआ तुमसे बतियाने का | सोचा तो नहीं कि किस स्पेशल टॉपिक पर तुमसे बात करूँ ....

मैं ऊँचे पहाड़ों के बीच रहता हूँ ,यहाँ नदियाँ हैं, झरने हैं, बर्फ से ढकी वादियाँ हैं , पहाड़ के सीधे लोग हैं और हर पहाड़ की चोटी पर किसी न किसी भगवान् का मंदिर है | कहते हैं पहाड़ों पर बच के रहना चाहिए, कभी ऊँची आवाज़ में गाना नहीं चाहिए कभी बांसुरी नहीं बजाना चाहिए कभी जोर से गुनगुनाना नहीं चाहिए क्यूंकि पहाड़ों में आछरियाँ(परियां) रहती हैं | उन्हें ये सब चीजें पसंद हैं तो जो भी ये सब करता है उसे हर (अपहरण) कर के ले जाती हैं |

मेरा भी मन करता है कभी कभी कि मिलूं उन आछरियों से बात करूँ उन से, कुछ एक बालगीत सुनाऊँ उन्हें ...पता नहीं उन्हें बालगीत पसंद आयेंगे या नहीं हा हा हा ... सूरज के देश में चंदा के गाँव में .... या फिर ... सूरज गोल चंदा गोल... या कोई कहानी सुना दूंगा उन्हें अपनी लिखी कोई... मैं बादलों में उड़ना चाहता हूँ उन के साथ... ऊँचे से ऊँचे पहाड़ों को छूना चाहता हूँ उन के साथ... और मन हुआ तो फिर लौट आऊंगा फिर अपनी इस ज़िन्दगी में वापस ...और हाँ उन्होंने छोड़ा तो, क्यूंकि सारी कहानियों में हरण करने की कहानियां तो हैं पर लौटने की कहानियां एक भी नहीं....

किसी भी पल को महसूस करना एक अलग एहसास है , मुसाफिर बने रहने के चक्कर में ज़िन्दगी तुम और  दुनियां दोनों ही पीछे छुटती गयी | छोटे बच्चों को जिद्द करते देखा ही होगा तुमने कुछ आंसू गिराए नहीं कि सारी दुनिया चल पड़ती है उन ज़िद्दों को पूरा करने और आंसुओं को साफ़ करने , पता अब वो दिन याद आते हैं क्यूंकि बड़े होक हम जिद्द नहीं कर पाते क्यूंकि अब आंसुओं के सैलाब भी किसी का दिल नहीं पिघला पाते |

ज़िन्दगी बहुत खुबसूरत हो तुम पर तुम्हारी खुबसूरती की कीमत बहुत भारी भरकम है | मकड़ी का जाला हो तुम फंस जाते हैं इसमें सारे | पाना खोना और खोना पाना दोनों के मतलब हिंदी की किताब के हिसाब से तो एक ही हैं पर तेरी हिसाब से बिल्कुल अलग |

मैं अकेला पहाड़ों, नदियों से बातें करता हूँ वो जवाब भी देते हैं वो ज्यादा अच्छे हैं वो धोखा नहीं देते कभी मजाक नहीं उड़ाते कभी , वो सब कुछ सुनते हैं , वो बहुत अच्छे हैं |

ज़िन्दगी वक़्त के पन्ने पलट के मुझे बचपन में पहुंचा दे आज ही जहाँ कीमत है आंसुओं की.... शायद बहुत से रिश्ते ज़िद्दों में ही पा लें हम जो हम ने खो दिए हैं जाने अनजाने पाने,खोने और खोने पाने के चक्कर में...
आज इतना ही कभी और फिर गुफ्तगू करेंगे ...
तुम्हारा
ज़ज्बात ए बिमल 
Share:

क्या हम वाकई सुरक्षित हैं न्याय के दरवाज़े तक पहुँचने के लिए ? :: प्रधान न्यायाधीश के नाम ख़त

माननीय
             प्रधान न्यायाधीश
              सर्वोच्च न्यायालय
                    भारत
पहला ख़त आप को लिख रहा हूँ और बहुत मजबूर हो कर लिख रहा हूँ | मैं रिसर्च प्रोग्राम का  हिस्सा बन के भारत के गांवों को करीब से देख रहा हूँ, समझ रहा हूँ | भारत के विकास के लिए चल रही योजनाओं को करीब से जान रहा हूँ कि कैसे योजनायें बनती है कैसे जमीन पर पहुँचती हैं और उस के फेल पास होने के क्या क्या कारण होते हैं ? इस दौरान मेरे पास कुछ एक सरकारी स्कूल भी हैं जहाँ के बच्चों को मैं पढ़ता भी हूँ और हर सरकारी कार्यक्रम चाहते न चाहते हुए भी जोर शोर से मनाता हूँ | ये कार्यक्रम मैं सिर्फ इस लिए नहीं मनाता क्यूँकी ये सरकारी आदेश होते हैं बल्कि इन कार्यक्रमों का अच्छा पक्ष बच्चों को समझाता हूँ | आज मुझ से एक छोटे से बच्चे ने सवाल किया कि गुरूजी कल कुछ लोगों को कोर्ट में वकीलों ने मारा किसी ने उन्हें क्यों नहीं रोका ?

मेरे पास जितना जवाब था मैंने उसे दिया पर उस के बाद मेरे मन में आप से पूछने के लिए कई सवाल खड़े हो गये | क्या न्याय पाने की एक मात्र जगह भी सुरक्षित नहीं है ? हम पुलिस पर विश्वास नहीं करते मिडिया पर विश्वास नहीं करते ,सरकार पर विश्वास नहीं करते ,हम सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं पर विश्वास नहीं करते, क्यूँकी सबने हमे ठगा है हमें धता दिखाया है हम ने इन सबके खिलाफ धरने दिए हैं ,कैंडल मार्च किये हैं ,जुलुस निकाले हैं ,गिरफ्तारियां दी हैं ,लाठियां खाई हैं क्यूँकी हमें विश्वास था कि हम सब सस्थाओं के खिलाफ हो लें पर जब हम न्याय के लिए आप के पास आयेंगे तो आप हमारी आवाज़ जरुर सुनेंगे हमें कम से कम बाहर नहीं पर न्याय के परिसर में बेख़ौफ़ होकर अपनी बात रख पाएंगे |

“मेरी नाराजगी आज आप से है”  मेरी नाराजगी सच में आप से है कि कैसे आप के परिसर में पत्रकारों को कल पीटा गया | मैं ये बात एक पत्रकारिता के छात्र होने के नाते नहीं कह रहा बल्कि एक आम आदमी के नाते कह रहा हूँ कि मुझे आप ही बताओ कि मैं सुरक्षित कहाँ हूँ ?

क्या मैं अपने देश में सुरक्षित हूँ ? मैं अगर भारत की किसी योजना पर अपनी टिप्पणी देता हूँ तो मैं देश द्रोही हो जाता हूँ ,मेरी माँ बहिन दोस्त इस देश में अपनी मर्ज़ी से जी नहीं सकती, अपनी मर्ज़ी के कपडे नहीं पहन सकती, अपनी बात नहीं रख सकती अपनी मर्ज़ी से बाहर नहीं जा सकती शादी नहीं कर सकती | हम तो अपनी लैंगिकता को भी अपनी इच्छानुसार नहीं रख सकते | फिल्मों, साहित्यों, कलाओं, वाद विवाद के केन्द्रों पर प्रतिबन्ध लग रहे हैं | मैं चाहते न चाहते हुए भी धर्म जात की राजनीति पर मजबूर हो रहा हूँ | कहने को मैं आज़ाद भारत में पैदा हुआ और शिशु /विद्या मंदिर के स्कूल में पढ़ते हुए अपने देश के बड़े गौरव गान सुने हैं मैंने पर वहां से निकलने के बाद जब मैं उसे धरातल पर खोजता हूँ तो मुझे वह कहीं नहीं मिलता और सिर्फ यह दिखता है कि देश और राष्ट्र वाद के नाम पर जहर बो रहे हैं और जहर काट रहे हैं |

मैं कभी विरोध और मुर्दाबाद की राजनीति का समर्थक नहीं रहा मैं हमेशा जमीन पर लोगों के साथ खड़े होकर स्थानीय जवाबों का समर्थक रहा हूँ और हमेशा न्याय पर विश्वास रखने वाला रहा हूँ पर आप ही बताइए मैं कैसे भीड़ में खड़े आम आदमी को ये विश्वास दिलाऊ कि हमारे न्यायालयों में सब की सुनवाई होती है ? मैं कैसे लोगों से बात कहूँ कि जब सारे दरवाज़े बंद हो जाएँ तब भी न्याय की रौशनी बाकी है ? कोर्ट में पीटे जाने के बाद मन में सवाल जरुर उठ रहा है कि क्या हम वाकई सुरक्षित हैं न्याय के दरवाज़े तक पहुँचने के लिए ? और ये सवाल सिर्फ मेरे दिमाग में है इस पर मुझे बहुत बड़ा शक हैं |

सबसे बुरा तक होता है जब आवाजें मरनी शुरू होती है और विचारों का दमन शुरू होता है और अगर आज अगर न्याय के परिसर में भी ये सब शुरू हो गया तो फिर कैसे आज़ादी ? कैसे संस्कृति ? और कैसा राष्ट्रवाद ?

मेरी राजनैतिक समझ बिल्कुल नहीं है तो किसी मुद्दे पर बात नहीं करूँगा बस माननीय न्यायाधीश महोदय भीड़ में खड़े आखिरी इंसान के लिए आप तक पहुँचने तक का रास्ता बंद हो ऐसी नौबत मत आने दीजियेगा क्यूँकी उस के लिए न्यायालय ही इन्साफ की पहली और आखिरी सीढि हैं | मेरी लिखी बातों में कोई गलती हो तो मुझे माफ़ करें पर आप इन बातों का सीधे संज्ञान लेकर तथा उचित कदम उठा कर न्याय पर लोगों के विश्वास को बचा सकते हैं |   
आप पर विश्वास रखने वाला
बिमल रतूड़ी        

  

Share:

फिर भी क्या सुनेंगे लोग मुझे ?


खड़े हो कर सबके सामने बोलने के लिए हौसला चाहिए, 
आम भीड़ में बोलने के लिए शब्दों का जाल चाहिए,
ख़ास भीड़ में बोलने के लिए हुनर चाहिए,
कोई कहता है पढो पुराने और नए लोगों की लिखी बातें, 
उन का नजरिया सुनो और कहो उन की कही बातें,
और इन बातों से हर वक्त डर सा जाता हूँ मैं, 
कि कहीं वो बात मुझ में है या नहीं, 
कहीं वो जज्बात मुझ में है या नहीं, 
क्यों कहूँ मैं नजरिया किसी और का, 
क्यों कहूँ मैं अनुभव किसी और का,
मैंने नहीं पढ़ा किसी और को ,
मैंने नहीं सुना किसी और का लिखा,
सिर्फ थोडा घूमा और बतियाया है कुछ लोगों से 
पर  फिर भी क्या सुनेंगे लोग मुझे ?
Share:

आमिर खान के नाम ख़त || सत्यमेव जयते पे पलीता


नमस्ते आमिर बाबू,
कैसे हैं , जो किस्से कहानियां आप कह रहे हैं समझ सकता हूँ आप के दिल में क्या चल रहा है | सच कहूँ तो मोदी जी जिस दिन से प्रधानमंत्री बने थे मुझे यही उम्मीद थी कि यही सब देश में होने वाला था | राजनैतिक,धार्मिक,बौद्धिक स्वतंत्रता पर जिस तरह के कुठाराघात हुए हैं कई सवाल खड़े करता है ये | देश में माहौल वाकई बहुत ख़राब है | मुद्दे अब इन्टरनेट में चलने वाले पॉपअप की तरह हो गये हैं मुझे सच में याद नहीं आ रहा बिहार इलेक्शन के बाद मैंने “गाय” पर कोई अच्छी खबर या डिबेट देखी हो | भटक गये हैं हम बहुत ज्यादा | यहाँ पर लेखकों के अवार्ड वापसी पर खूब हंसी ठट्ठा हुआ क्यूंकि चाहे भले ही वो अपनी भाषा या ज्ञान के सर्वश्रेष्ट हों पर वो उँगलियों पर गिने जाने वाले चंद लोग हैं , उनका मजाक उड़ाना बहुत आसान है पर मुझे एक भी हास्य व्यंग फौजियों पर उड़ता सुनाई नहीं दिया, क्यों ? अजी वोट बैंक हैं वो पूरे देश की कई लोकसभा विधानसभा सीटों का भविष्य तय करते हैं वो फौजी | हाँ बाबू सब वोट बैंक की राजनीति है |

पर मैं आप को ये सब क्यूँ सुना रहा हूँ क्यूंकि अधिकतर बातें आप को मुझ से ज्यादा ही अच्छी तरह से पता होंगी |    

"कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है "
आमिर बाबू आप की ही फिल्म "रंग दे बसंती" का डायलॉग है न ये, ये वही फिल्म है जिसे मैं आजतक 100  से ज्यादा बार देख चुका हूँ जब भी मैं यहाँ के सिस्टम से परेशान होता हूँ तो अन्दर छटपटाहट होती है तो इसी फिल्म को देख कर खुद को मोटिवेट करता हूँ | कॉलेज में पढने वाले अधिकतर लड़के “सत्यमेव जयते” के सारे सीजन के विडियो अपने पास रखते हैं और देश गर्व करता है आप पर कि देश के मुद्दों को इस तरह से पहली बार उठाया गया | दुनिया भर में “अतुल्य भारत” से जो आप ने हमारी इमेज गढ़ी थी वो आप एक स्टेज से भरभराकर कर गिरा दी ....
मैं सहमत हूँ देश में हालात ठीक नहीं है पर यही बात अगर आप अपनी किसी फिल्म या डाक्यूमेंट्री के माध्यम से कहते तो शायद उस बात में अलग वजन होता | आप की कही बात ने असहिष्णुता पर बहस घुमाने से ज्यादा हिन्दू मुस्लिम मुद्दे को हवा दे दी है | आप के लिए दुनिया के किसी भी कोने में रहना आसान है पर देहरादून में बंजरावाला के चाँद चक इलाके में रहने वाले मुश्ताक चचा कैसे किसी पर विश्वास करें ? कैसे वो अपने बच्चे  को पढने या नौकरी करने बाहर भेजें क्यूंकि उनकी कौम के सबसे बड़े कलाकार ने तो कह दिया कि उन का परिवार यहाँ के माहौल देख के देश छोड़ के जाना चाहता है ....
अपनी बात कहना जरुरी है , विरोध प्रतिरोध करना उस से जरुरी है, क्यूंकि विरोध तंत्र के खिलाफ होता है किसी एक आदमी के खिलाफ नहीं | आमिर भारत ने आप को गढ़ा है आप ने खुद पे मेहनत की पर उस मेहनत की कद्र पूरे भारत ने की |
आप बतिया कर हंगामा कर करेंगे उम्मीद नहीं थी , आप से एक नए तरह की विरोध की उम्मीद थी , आप से उम्मीद नहीं थी कि आप भारत को धडों में बाँटने की कोशिश करेंगे , आप से उम्मीद नहीं थी कि आप भागने की बात करेंगे ...
केवल रंग दे बसंती का डायलॉग "कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है "ही सुना देते जब किरन ने आप से देश छोड़ने की ये बात कही थी....
आप ने निराश किया आमिर... आज लैपटॉप से “रंग दे बसंती” को डिलीट मारने का मन कर रहा है | आप ने सत्यमेव जयते बना कर जितना किया धरा था आप के स्टेटमेंट से उस पे पलीता मार दिया | आप बड़े लोग है कहीं भी आ जा सकते हैं पर मुझे वाकई डर रहीम..रहमान ..सुल्तान चचा का लग रहा है कि उन की ज़िन्दगी पर आप की कही बात का क्या असर होगा...
आप तो खैर मुझे जानते नहीं है फिर भी आखिर में चिट्ठी लिखने वाला अपना नाम तो लिखता ही है
बिमल रतूड़ी   
Share:

एक मुसाफिर और सराय

मुझे उम्मीद नहीं थी कि मैं तुम्हारी शादी में आऊंगा , तय भी था मेरा न आना पर मैं मजबूर हुआ रिया की खुद की कसम देने से...समझाया भी उसे कि कितना मुश्किल है मेरे लिए वहां जाना...पर उस ने कहा बातें बहुत पुरानी है और कभी सुखी हुई जड़ों को पानी दिखाने से वो हरी नहीं होती...
रिया के बातों के जवाब नहीं थे मेरे पास और इतनी हिम्मत भी नहीं कि उस की दी कसम तोड़ दूँ ...
दिल्ली से टवेरा में रात का सफर कर के सुबह शिमला पहुँचे तुम्हारे बताये हुए गेस्ट हाउस में बैग डाला और रिया सीधे ही तुम्हारे घर हो ली आखिर उस की बेस्ट फ्रेंड की जो शादी थी कोई भी रश्म कोई भी रिवाज़ को वो छोड़ना नहीं चाहती थी ।
मेहँदी की रात थी आज , तुम्हारे हाथों और पांव में मेहँदी लगी थी । कॉलेज के दिनों में बातों के पुलिंदों में एक बात यह भी थी क़ि तुम्हारे हाथों में मेरे नाम की मेहँदी लगेगी, पर वक़्त कहाँ किस्सागोहि पे यकीं करता है उसे कुछ और ही मंजूर था और यही है कि तुम सज धज के हाथों में किसी और के नाम की मेहँदी लगाये हो और मैं....तुम्हारी शादी का एक मेहमान ...

 तुम बहुत सुन्दर लग रही हो...  मैंने कहा... और तुम ने डबडबाई हुई आँखों से कुछ वक़्त एक टक देखा मुझे...काश तुम्हे मैं गले लगा सकता... तुम्हारी पीठ पे थपथपाया...और तुम्हे जाने को कहा क्योंकि सब तुम्हारा इन्तजार कर रहे थे... तुम्हारी डबडबाई आंखो के सवाल मुझे पता थे , पर मेरे पास उन सवालों के आज भी जवाब नहीं हैं । ये रात गीत संगीत में ही खत्म हो गयी मैं भी जल्दी गेस्ट हॉउस में आ गया था , एक पैग लिया... शराब कौन सी थी पता नहीं... दो कड़वे घुट एक साथ ले रहा था मैं ...एक महबूबा की शादी का और खुद इस शराब की कड़वाहट ...कौन ज्यादा कड़वा है ..इस के जवाब खोजते कब नींद आ गयी पता ही न चला...

अगले मेरी सुबह काफी लेट हुई ,फोन को देखा तो रिया की 18 मिस्ड कॉल थी ...उफ्फ्फ ...डाँट खाने के लिए खुद को तैयार कर के रिया को फोन लगाया तो उस ने फ़ोन काट दिया, उस के गुस्से को मैं जानता था पर थोड़ी देर में मोबाइल पे रिया का मैसेज आया ...तैयार रहना तुम्हे मुझे और तुम्हें ब्यूटी पार्लर ले जाना है ..उफ्फ मैं तुमसे अकेले में नहीं मिलना चाह रहा था पर मुझे सच में नहीं पता  ज़िन्दगी बार बार मुझे ऐसे चौराहों पे क्यों लाकर खड़ा कर देती है ?

दिन की 3 बजे के करीब तुम मैं और रिया पार्लर के लिए निकले, एक तरफ रिया की बातें बंद नहीं हो रही और दूसरी तरफ मैं खुद के कई सवालों से जूझ रहा था , तुम्हारी आँखों के सवाल मेरे जहन में अब भी ज़िंदा है और कब तक रहेंगे पता नहीं ... जाते वक़्त खामोश ही रहा मैं ..
जब तुम पार्लर से बाहर आई तो यकीं कर पाना मुश्किल था तुम ऐसे रूप में मेरे सामने थी जिस की सपने में भी कल्पना मैंने नहीं की थी, खुबसूरत कहना तुम्हे उस वक़्त कम आंकने जैसा था...मुस्कुरा दिया तुम्हें देख कर बस्स....

तुम कार में बैठ चुकी थी रिया को पता नहीं क्यों वक़्त लग रहा था , हम दोनों की नज़रें मिली मैंने दोनों हाथों से उस के हाथों को पकड़ा और कहा माफ़ी मांगी मुझ में हिम्मत नहीं है कि मैं किसी का अभी सहारा बन सकूँ तुम्हे सराय बनना है और मुझे अभी मुसाफिर ही बने रहना है..मुसाफिर सराय से दोस्ती नहीं करते .. क्योंकि उन्हें उस सराय को छोड़ एक दिन  आगे बढ़ जाना है... तुमने कहा जब पता था कि तुम मुसाफिर हो फिर इस सराय के इतने करीब क्यों आये...
इतना कह के दोनों के हाथों की जकड़न ढीली छूट गयी ...रिया भी आ चुकी थी तब तक ...और सीधे ही गाडी घर को मोड़ ली ..

तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ा और मैं गेस्ट हॉउस में चेंज करने आ गया..लेट तक रुका ताकि तब तक बारात गेट तक पहुँच जाए ।

जब मैं आया तब तक बारात अंदर आ चुकी थी ,काले सूट में तुम्हारा राजकुमार अच्छा लग रहा था..जलन नहीं थी उस से पता नहीं क्यों.. जितना बताया था तुमने उस के बारे में तो सुकून था कि तुम अच्छे घर जा रही हो...

वरमाला के बाद फेरे थोडा भारी गुजरे मुझ पे और उस के तुम्हारी मांग पे सिंदूर भरने के बाद पता नहीं क्यों अपने आँसू रोक नहीं पाया मैं...रिया बगल में बैठ के सब देख रही थी उस ने भी कुछ नहीं कहा और न ही रोका मुझे...दुःख था मुझे तुमसे दूर जाने का पर तुम्हे पाना नहीं चाहता था मैं...

सुबह के तकरीबन 6 बज रहे थे मैंने रिया को चलने को कहा बैग पहले ही रखवा चुका था गाडी में...

हाथ मिलाया तुम्हारे पति से जब तुमने उसे दोस्त कह के मेरा परिचय दिया दोनों को ख़ुशी जीवन की शुभकामनाएं दे कर पलट गया... एक नयी राह पे...

रास्ते भर काफी कुछ सोच रहा था और खुद पे यकीं करना भी मुश्किल हो रहा था कि मैंने ये पल इतनी आराम से गुजार लिया...आराम तो नहीं पर कोई गम नहीं है तुमने अपनी राह चुनी और मैंने अपनी....तुम मेरी ज़िन्दगी का वो ए सपना थी जिसे मैं पाना नहीं चाहता था पर कभी खोना भी नहीं चाहता था.... पर सपने कहाँ सच होते हैं...

और तभी रेडियो से गाना बजा...
शामें मलंग सी ...रातें सुरंग सी...
बागी उड़ान पे ही ना जाने क्यों...
इलाही मेरा जी आये आये...
इलाही मेरा जी आये आये...

और गाडी शिमला की सर्पीली रोड पे नीचे उतर रही थी..शायद लग रहा था ज़िन्दगी का एक रिश्ता भी एक असफल मुकाम के बाद नीचे उतर रहा है...


Share:

अजनबी के नाम पाती : दुनिया की खूबसूरती और विरोध की आवाज़


हेल्लो अज़नबी
कैसी हो?क्या चल रहा है ज़िन्दगी में?
बहुत दिन हो गए थे तुम से बतियाये हुए तो आज देर रात मन हुआ तुम्हे ख़त लिखने का...
दुनिया में अलग अलग तरह के लोग होते हैं पर कुछ एक लोग होते हैं जो नज़रों में रहते हैं हरवक्त । एक आम इंसान की नज़र से देखूं तो पाता हूँ कि ये सब वो जान बुझ कर करते हैं पर अगर उनके जूतों में पांव ड़ाल कर देखूं तो समझ बनती है कि उन का नजरिया ही अलग है चीजों को देखने का ,उसे बिल्कुल फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप उस के बारे में क्या सोचते हैं?
वो दुनिया को एक कैनवास की तरह देखते हैं और इंसान को कूची और इंसानियत को रंगों की तरह और इन सब के साथ वो सबसे अच्छी पेंटिंग बनाना चाहते हैं और जब भी कोई इस पेंटिग बनाने में कोई अड़चन डालता है या कोशिश करता है तो वो आवाज़ उठाते हैं।
"प्रतिरोध की आवाज़""विरोध का स्वर" तरीका कुछ भी हो सकता है उन का|
और सबसे मजेदार होती है आम आदमी की प्रतिक्रिया ...अरे पहले काहे नहीं विरोध किया?
जरूर इन का काम कुछ रुक गया होगा...ब्ला...ब्ला...ब्ला...
विरोध का कोई वक़्त,तरीका नहीं होता और ये उस आदमी के ऊपर है कि वो कैसे अपना विरोध जताता है...
लड़ाई कभी किसी व्यक्ति केंद्रित नहीं रहती उन लोगों की ,मतभेद वैचारिक है तंत्र को सुधारने के लिए..उस खूबसूरत इंसानियत के रंगों को बचाने की जद्दोजहद है ये सिर्फ...
पर मुझे एक बात और भी लगती है आम लोग भी उस पेंटिंग का मुख्य हिस्सा हैं तो वो ख़ास लोग जो इस दुनिया को एक सुन्दर पेंटिग में बदलना चाहते हैं वो उन लोगों के और पास जाएँ और अहमियत समझाएं इंसानियत के अलग अलग रंगों की ताकि सारे लोग इस दुनिया को खूबसूरत बना सकें और अपने विरोध के स्वर को भी बल दे सकें उन लोगों के खिलाफ जो रोक रहे हैं इस दुनिया को खूबसूरत बनने में...
आज के लिए इतना ही..जल्द ही बात करेंगे फिर....
तुम्हारा
जज्बात-ए-बिमल

Share:

“चंद लोगों” के नाम ख़त


मेरे प्यारे “ चंद लोग ”
कैसे हो तुम ? उफ्फ बस्स बस्स समझ गया मैं कि तुम परेशान हो कि मैंने तुम्हारा वो नाम क्यूँ नहीं लिखा जिस नाम से तुम्हे सब जानते है पर ये ख़त मैं उस सारी बिरादरी को लिख रहा हूँ जो उस “चंद” लोगों में आती है और पता उस चंद लोगों की न कोई जाति है न धर्म न ही उस में लिंग भेद है क्यूंकि वो सिर्फ चंद लोग हैं...
कुछ एक किस्से कहानियां हैं जो तुम्हे सुनानी हैं
कुछ एक दिन पहले एक दोस्त से बात हो रही थी उस ने कहा यार ये एन.जी.ओ. वाले सारे बहुत घटिया लोग हैं, सारे के सारे पैसा खाते हैं कोई कुछ काम नहीं करता सब फण्ड के हेर फेर का खेल है | मैंने उसे कहा यार कितने टाइम से तुम इन एन.जी.ओ. वालों से जुड़े हो? उस ने कहा 1 साल एक एन.जी.ओ में काम किया था | दूसरा सवाल मैंने किया यार तुमने कितने एन.जी.ओ. में घूमा हैं ? उस ने जवाब दिया घूमा तो नहीं पर मैं सब जानता हूँ | (यहाँ पर पहली कहानी ख़त्म होती है...)
एक दोस्त से बात हो रही थी तो वो हाई प्रोफाइल स्कूल में टीचर हैं उन्होंने मुझ से बोला बिमल तुम फालतू ही गाँव में अपनी ज़िन्दगी ख़राब कर रहे हो ये सरकारी स्कूल न कभी सुधरे थे न कभी सुधरेंगे ? वहां के टीचर कभी कुछ नहीं करते ..वो मैडम होती हैं वो सिर्फ स्कूलों में स्वेटर बुनती है बाकी कुछ नहीं करते | मैंने उन से पूछा तुम कभी सरकारी स्कूल गयी हो ? जवाब न में मिला दूसरा सवाल किया मैंने कभी किसी मैडम को स्वेटर बनाते खुद देखा है ? जवाब मिला नहीं खुद तो नहीं देखा पर मैंने सुना है |(यहाँ पर दूसरी कहानी ख़त्म होती है...)
जेंडर पर हो रही एक कार्यशाला में एक युवा ने सवाल किया कि महिलाएं बहुत से कानूनों का गलत फायदा उठाती हैं और कई झूटे आरोप भी लगाती हैं और इस बात को साबित करने के लिए टाइम्स ऑफ़ इण्डिया अखबार में छपी किसी रिपोर्ट का हवाला दे रहे थे | मैंने सवाल किया कभी किसी बलात्कार लड़की से मिले हो ? उस ने सर न में हिलाया | मैंने फिर पूछा कभी किसी ऐसी महिला से मिले हो जिस ने जूठे आरोप लगा कर सब कुछ हड़प लिया हो और ऐश से अपनी ज़िन्दगी काट रही हो ? ? जवाब मिला नहीं खुद तो नहीं देखा पर मैंने सुना है |(यहाँ पर तीसरी कहानी भी ख़त्म होती है...)
अब तुम्हे ये लग रहा होगा कि ये किस्से कहानियां मैंने तुम्हें क्यूँ सुनाई ? ऊपर तीनों कहानियों में कुछ एक चंद लोग थे जो कभी उन हालातों से नहीं गुजरे पर उन्होंने फिर भी एक भारी भरकम विचार बना लिया है कि ऐसा ही होता है सब जगह पहली कहानी में वालंटियर स्तर पर काम करने वाला एक बंदा सारे एन.जी.ओ. सिस्टम को गलत ठहरा रहा था दूसरी में कभी सरकारी स्कूल न देखे हुए उस सिस्टम में कभी न आने वाले बदलाव के बारे में बता रही थी और तीसरे में महिला मुद्दों की A..B..C..D भी न जानने वाले सारी महिलाओं को झुटा ठहरा रहे थे | कितना आसान था ये सब....
अब मेरे प्यारे “चंद लोगों” मैं तुम्हे जवाब देता हूँ तुमने तो सिर्फ एक वाक्य बोला पर तुम्हे कुछ भी पीछे की कहानियों का पता नहीं है तुम्हे नहीं पता कि कितना मुस्किल है किसी भी महिला के लिए सिर्फ इतना रिपोर्ट करना कि मेरे साथ कुछ गलत हुआ है | तुम्हे खबर नहीं है सरकारी स्कूलों के सिस्टम का और न ही उन एन.जी.ओ. वालों का जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी खपा दी लोगों के बीच निस्वार्थ भाव से काम करने में |
ऐसे ही कुछ कह देना आसान होता है बहुत आसान पर कितना मुस्किल होता है खुद को उस जगह पर रख के देखना... किन्ही एक दो लोगों की हरकत के लिए हम सब को कभी जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते ...
बातों से पब्लिसिटी पाना बहुत आसान है पर गौर करो अपनी बातों पर कहीं तुम्हारी कही किसी बात का किसी की ज़िन्दगी में बहुत बुरा असर न हो जाए और जब तक तुम उस बात पर अपनी समझ बना पाओ तब तक सामने वाले की ज़िन्दगी ताश के पत्तों की तरह बिखर चुकी हो ...
तो उम्मीद करता हूँ “चंद लोगों” से कि कोई भी बात कहने से पहले ये जरुर सोच लें कि जो बात कह रहें हैं उस का असर क्या हो सकता है ...और मुझे पता है आप सिर्फ चंद लोग ही है क्यूंकि दुनिया में औरों को काफी काम है गपियाने के अलावा ...
खैर
मैं तुम्हारा वही ..
जज्बात-ए-बिमल
Share: