Thursday, April 02, 2015

सिर्फ मैं ही क्यूँ ?

पत्रकारिता के कॉलेज में जब सर न्यूज़ या आर्टिकल लिखना सिखाते थे तो कहते थे कि पहले कोई भी न्यूज़ या आर्टिकल लिख दो और फिर उस को एक दो बार पढ़ कर उसे फिर एक अच्छा सा टाइटल दो और अधिकतर में करता भी यही हूँ पर जिस पर आज मैं लिख रहा हूँ ये सवाल मेरे दिमाग में कई बार आता था और ऐसा नहीं है कि ये मेरे दिमाग में जन्मा हो इस का सीधा संबंध लोगों के बीच जा कर उन की कहानियां सुन कर,सेमिनारों में सवाल जवाबों को देख कर और किताबों की दुनिया के कई चक्कर मार कर कौंधा है “सिर्फ मैं ही क्यूँ ?” 

                          

हाँ “सिर्फ मैं ही क्यूँ ?” सवाल बहुत बड़ा है और तक़रीबन बात करूँ तो हम सब की जिंदगियों को छूता है पर सब कुछ समेटना शायद संभव नहीं है तो एक बड़ा मुद्दा युवा ले रहा हूँ और बातचीत उसी के आसपास करूँगा | कुछ दिनों पहले एक काउंसलर से मिला था उस से में पूछा कि जब तुम काउंसिलिंग करते हो तो सब से ज्यादा मुश्किल हिस्सा क्या होता है तो उस ने जवाब दिया सब से ज्यादा मुश्किल हिस्सा होता है किसी के दिमाग से ये सवाल ही हटा पाना कि “ये मेरे साथ ही क्यूँ हुआ” और ये काफी बड़ी वजह है जिस से किसी के ठीक हो जाने में काफी वक़्त लग जाता है|

कईयों के साथ छेड़खानी,जबरदस्ती,बलात्कार जैसी घटनाएँ होती हैं जिन का असर उन की जिंदगियों पर ताउम्र रहता है और हमारे सामाजिक तानेबाने से उन के अन्दर एक भावना आ जाती है कि शायद इस के लिए कहीं ना कहीं जिम्मेदार थी मैं और यह बात केवल महिला मुद्दों तक ही सम्बंधित नहीं है रिश्तों में धोखा मिलने और परीक्षाओं में सही प्रदर्शन ना कर पाने के बाद भी यही हीन भावना धर करने लगती है | और जिन लोगों को लगता है यह भावना महिलाओं में ज्यादा होती है तो आप गलत है पुरुषों में भी यह समस्या आम है | मैं समस्या के डिटेल में नहीं जा रहा क्यूंकि शायद अपने आसपास होने वाली इस बात से आप भी अच्छे से रूबरू है |

अगर मैं समाधान की बात करूँ तो इसे मैं एक सच्ची घटना से कनेक्ट करूँगा, एक हंसती खेलती लड़की थी रिया स्कूल से कॉलेज तक टॉप करने वाली सब की चहेती थी,काफी बड़े ख्वाब थे उस के और उन्हें पाने के लिए काफी मेहनत भी करती थी,एक इंटरनेशनल फाउंडेशन द्वारा उसे आगे की पढाई अमेरिका मे करने के लिए स्कोलरशिप मिली ये उस के सपनों के पुरे होने जैसा था पर शायद कहानी को किसी और मुड़ना था एक दिन कॉलेज से रिक्सा में आते हुए किसी ने उस के चेहरे पर तेजाब फेंक दिया,चेहरे का काफी हिस्सा जल गया था और किसी तरह उस की जान बची | चार पांच महीनें इसी में लग गए जिस वजह से वो अमेरिका नहीं जा पाई| जिस दौरान वो अस्पताल में थी तो उस से मिलने कई लोग आये और काफी कुछ बातें की जो किसी घटना के बाद हमारा समाज करता ही है और इन बातों को सुनने के बाद जब उस ने इन बातों पर गौर किया तो पाया कि इन बातों का उस से कोई संबंध ही नहीं है और ना ही वो इस के लिए कहीं भी जिम्मेदार है, और उस की क्षमताओं में भी कोई कमी नहीं आई है और उस ने इस बात को एक सामान्य घटना मान कर अपनी ज़िन्दगी में कुछ नए सपने संजों लिए और उन्हें पाने में लग गयी | आज वो अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर है कई बड़े सपनों के साथ वो वापस भारत आने की सोच रही है |

रिया की कहानी कई सवालों का जवाब है कि जब भी हमारे साथ कोई असामान्य घटना होती है तो हम ये कुंठा ना पाल ले कि इस की वजह मैं हूँ,
आप किसी भी तरह इस घटना के जिम्मेदार नहीं है यह घटना किसी के साथ भी हो सकती थी और आप आंकड़े उठा के देखिये लाखों लोग हैं दुनिया भर में, पर इस घटना के बाद चाहे भले ही आप ने अपनी ज़िन्दगी को रोक लिया हो पर क्या बाहर दुनिया रुक गयी? एक पेड़ की जब कोई डाली टूट जाती है तो क्या उस पर नयी डाली नहीं आती ? बस्स नयी शुरुवात करें क्यूंकि नया कुछ भी करने का कोई स्पेशल वक़्त नहीं होता .... “जब जागो तभी सवेरा”  

अब आयें उन बातों पर जिन में हम असफल हो जाते हैं चाहे तब वो रिश्ता हो या कोई परीक्षा, रिश्तों हार जीत से परे होते हैं और किसी ने आप को धोखा दे दिया है तो शुरुवात तो रिश्ता सुधरने की कोशिश से करें पर अगर रिश्ता ना सुधरे तो आगे बढ़ने में ही भलाई है क्यूंकि किसी एक की वजह से अपनी दुनिया आप रोक लें ये उन लोगों के लिए बुरा होगा जिन की ज़िन्दगी का आप अहम् हिस्सा है और किसी और के हो ना हों आप अपनी ज़िन्दगी यूँ ही थोडा ना रोक लेंगे .. परीक्षा में असफल होना शायद हमारे लिए एक सीख है कुछ एक देर अपने झाँकने के लिए कि हमारे अन्दर क्या कमी रह गयी और कैसे उस में सुधार किया जा सकता है क्यूंकि सच मानिये “
किसी भी ठोकर के बाद हमेशा आदमी आगे ही गिरता है कभी पीछे नहीं आता” तो ठोकर खाने से मत दरिये क्यूंकि गुंजाईशें हमेशा रहती है सुधार की |

 और आखिर में यही कहूँगा जब दिल धडकता है तो ई.सी.जी मॉनिटर में दिल की धड़कने ऊपर नीचे ऊपर नीचे चलती है पर जब कोई मर जाता है तो वो धड़कन सीधी रेखा में बदल जाती है , यही ज़िन्दगी भी है ज़िन्दगी में आये उतर चढ़ाव दिखाते हैं हम जिंदा है और आगे बढ़ रहे हैं |

                          

हर चीज के लिए आप ज़िम्मेदार नहीं हैं और जो आप के साथ अभी हो रहा है वैसा फील करने वाले आप दुनिया के पहले इंसान नहीं है तो वक़्त क्यूँ बरबाद करना ?? आगे बढ़ो सिर्फ आगे बढ़ो ....क्यूंकि वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता ...किसी के लिए नहीं....   
                                           
   

1 comment:

  1. Jab tk saans chal rahi hai,jeene ki lalak hai tab tk koshish krte raho :) safalta na sahi santusti jaroor milegi....good article for people who want to move on in their life.....jo beet gya use peeche hi chod do :)

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