माँ


आज अकेले कमरे में बैठ आंखे भर आई,
कहीं से तेरी याद माँ दिल को छूने चली आई...
वो हाथों से रोटी खिलाना,वो अपने ही हाथों से रोज मुझ को नहलाना, 
वो दूध मुझे रोज पिलाना,वो लड़ने पे मुझे प्यार से समझाना,
मै तो बड़ा हुआ,पर तेरी ममता न बदली,
उम्र तेरी ढली पर ममता की कभी छावं न ढली, 
भले ही आज इतना मै दूर हूँ, पर तेरी छावं से ही महफूज हूँ,
तेरी दी खुशियों से ही तो माँ आज मै  मगरूर हूँ |
फिर भी न जाने क्यों आज मन उदास है,
तेरे पास आने की मेरे दिल की एक आस है,
सोचता हूँ तू मुझ से मीलों दूर, स्कूल के बच्चों को पढ़ाती
बिना कुछ परवाह किये, पूरे निस्वार्थ से,
पर जब तेरे कानों में मेरी उदास आवाज होगी,
खुद कड़ी हो कहेगी “बिमल बस अब बड़ा हो गया है तू” 
फिर प्यार से पूछेगी अच्छा बता हुआ क्या है ?
फिर तू मुझे समझाएगी...
चाहे शब्द वो ही हैं बचपन से,फिर भी सुनना मुझ को अच्छा लगता है
 तेरे उन ज़ज्बातों को समझना अच्छा लगता है,
उन के साथ ही इस तन्हाई में जीना अच्छा लगता है,
इस झूटी दुनिया में माँ सिर्फ तेरा आँचल सच्चा लगता है ...


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2 comments:

  1. bahut hi badhia poem bimal bhai
    har shabd laajawab the

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