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अस्तित्व की सामाजिक लड़ाई है "विधवा "

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ये बात कहने का ख्याल मेरे दिमाग में पहली बार तब आया था जब 2013 में मैंने एक 21 साल की लड़की को देखा जिस ने तीन महीने पहले ही केदारनाथ आपदा में अपना पति खोया था |जो एक सरकारी कार्यक्रम में मुआवजे का चेक लेने देहरादून आई थी और भीड़ में सबसे पीछे बैठ कर अपने पर्स से निकाल कर बिंदी लगा रही थी | अचानक उसका नाम आगे से पुकारा गया उस का हाथ सबसे पहले उस बिंदी पर गया और उसे हटा के आगे सरकारी चेक लेने आगे गयी | मेरे दिमाग में पहला सवाल यही था कि क्यूँ उस ने वो बिंदी हटाई ? क्यूँ वो उस के साथ आगे स्टेज पर या यूँ कहें समाज के सामने क्यूँ नहीं गयी ? मैं ये सवाल उस से नहीं पूछ पाया क्यूंकि उस कार्यक्रम के बाद मैंने उसे नहीं देखा, सच कहूँ तो मैंने उसे खोजा ही नहीं क्यूंकि ये सवाल पचाने में मुझे काफी वक़्त लगा |
अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों पर बातचीत हो रही है | हर क्षेत्र में महिलाओं की बढती भागीदारी बढ़ते समाज का एक अच्छा पक्ष हमारे सामने रख रहा है | ऊपर लिखी घटना की छाप मेरे दिमाग में काफी गहरी थी तो मैंने पड़ताल को इस मुद्दे पर केन्द्रित किया | वर्तमान समाज मे…